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कौशाम्बी के पर्यटन स्थल बदहाल

Thu, 05 Feb 2015 12:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला कौशाम्बी
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मंझनपुर/बारा। कौशाम्बी का पिछड़ापन दूर करने के लिए ही अप्रैल 1997 में इसे अलग जिला बनाया गया था। जिला बनने के बाद लगा था कि गंगा-यमुना के बीच बसे कौशाम्बी के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल के दिन बहुरेंगे। यह जिला सूबे के पर्यटन मानचित्र में चमक उठेगा। पर, 18 साल बीतने के बाद भी यहां के पर्यटन स्थल बदहाल ही पड़े हैं।
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देखें तो कौशाम्बी में ऐतिहासिक धरोहरों का खजाना है।  यहां जहां यमुना किनारे राजा उदयन का किला, अशोक स्तंभ की लाट है। वहीं भगवान बुद्ध की तपोस्थली के साथ जैनधर्म के छठें तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का जन्म भी यहीं हुआ था। इसके अलावा पभोषा पहाड़, ऐतिहासिक अलवारा झील, सिद्धपीठ मां शीतलाधाम, राजा जयचंद्र का किला, संत मलूकदास का आश्रम, ख्वाजा कड़क शाह की मजार है। इन धार्मिक स्थलों पर प्रतिवर्ष हजारों लोगों का आना जाना है। भगवान बुद्ध की तपोस्थली को देखने को प्रतिवर्ष श्रीलंका, कंबोडिया, म्यांमार आदि देशों से हजारों की संख्या में विदेशी धर्मावलंबी भी कौशाम्बी आते हैं।

बीते वर्ष 2014 में ही 10,485 विदेशी धर्मयात्री कौशाम्बी आए थे। पर, इतना कुछ होने के बाद भी कौशाम्बी के पर्यटनस्थल बदहाल पड़े हैं। बुद्ध की तपोस्थली हो या फिर पद्म प्रभु का जन्मस्थान अथवा मां शीतला का दरबार। सभी स्थलों पर जाने वाली सड़कें गड्ढे में तब्दील है। आवागमन के साधन नहीं हैं। बिजली, पानी की अव्यवस्था है, तो तीर्थयात्रियों के ठहरने का भी 18 साल में कोई इंतजाम नहीं किया जा सका है। जबकि यहां के धार्मिक, ऐतिहासिक स्थलों को सजाने, संवारने और आवागमन आदि की सुविधाएं मिलने पर रोजाना देशी-विदेशी पर्यटकों का मेला लगा रहेगा। इससे जिले के विकास को भी नया आयाम मिलेगा।
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कौशाम्बी में गंगा और यमुना दोनों नदियां बहती हैं। गंगा किनारे यहां सिद्धपीठ मां शीतलाधाम और भगवान श्रीकृष्ण के गुरू ऋषि संदीपनि का आश्रम है। कड़ा और संदीपनि घाट पर पूर्णिमा, अमावस्या पर गंगा स्नान को भारी भीड़ पर आती है। पर, दोनों घाट उपेक्षा के शिकार है। घाटों का सौंदर्यीकरण नहीं हो सका है। फिसलभरे इन घाटों पर बिजली, महिलाओं के लिए चेंजरूम आदि नहीं है। इसके कारण जहां कपड़े बदलने में महिलाओं को दिक्कतें होती हैं। वहीं सुरक्षा की बदइंतजामी से आए दिन हादसे भी होते रहते हैं।

भगवान बुद्ध की तपोस्थली कौशाम्बी बौद्ध भिक्षुओं के लिए बड़ा तीर्थस्थल है। जहां प्रतिवर्ष बौद्ध धर्म मानने वाले हजारों लोग आते हैं। इतना ही नहीं तपोस्थली पर लाखों रुपये की लागत से श्रीलंकाई और कंबोडियाई बौद्ध मंदिर बनाए गए हैं। पर, इस तपोस्थली पर शासन-प्रशासन की ओर से कुछ नहीं किया जा रहा है। जिससे बौद्ध भिक्षुओं को दुख है। श्रीलंकाई मंदिर के भंते विशुद्ध थेरो बताते हैं कि सबसे बड़ी समस्या यहां की बदहाल सड़कें और यातायात का साधन नहीं होना है। कोई विश्रामालय भी नहीं है। इससे विदेशी तीर्थयात्रियों को इलाहाबाद से रिजर्व वाहनों से आना पड़ता है।
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