रुपया कमाने गए थे, मोटी रकम खर्च कर। सऊदीअरब जाने के लिए किसी ने कर्ज लिया था तो किसी ने उधार में रकम जुटाई थी। सऊदीअरब में टीकरडीह गांव के युवक पहुंचे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। बंधक बनाकर रखे गए। भूखे पेट सोए। वहां यह यातना की सारी हदें झेलकर मुल्क वापसी की राह ही देखते रहे। सारी आस तब इनकी टूटी जब इनको जेल भेज दिया गया। रोटी के चक्कर में ये हर जगह जलील हुए...। सऊदीअरब में तीन माह तक फंसे रहे युवक अपने-अपने घरों को आ चुके हैं।
सिराथू के टीकरडी निवासी मक्खन लाल हो या रमेश अथवा गनेश...। सऊदीअरब में दहशतभरी व खौफनाक जिंदगी गुजारकर आएं हैं, वह इनके जेहन से उतर नहीं रहा है। मंगलवार को अमर उजाला दफ्तर आए मक्खन लाल, रमेश, गनेश व कादीपुर निवासी ओम प्रकाश से जब पूछा गया कि उनके साथ वहां-वहां क्या हुआ? इस पर वह शून्य में निहारने लगे और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ा। मक्खन ने रमेश के कंधे पर हाथ रखते हुए बताया कि 11 सितंबर को वह सऊदीअरब पहुंचे। हॉयल के निजम्मा में भवन निर्माण के लिए उनको भेजा गया था। निजम्मा पहुंचते ही उनको खेत में काम करने के लिए भेज दिया गया। विरोध किया गया और वीजा का हवाला दिया तो उनका पासपोर्ट छीनकर बंधक बना लिया गया। दो दिन तक उनकी हालत कोई पूछने नहीं आया। न तो खाना दिया गया, न ही पानी दिया गया। वह तड़पते रहे, चीखते-चिल्लाते रहे।
दुहाई देते-देते गला भर्रा जाता था, लेकिन किसी को रहम नहीं आया। इसके बाद एक टाइम भोजन दिया जाता था और इसके बाद भूखा-प्यासा रखा जाता था। हफ्ते भर बाद उन्हें निकाल दिया गया। उनके पास कुछ नहीं था। कहां जाए और क्या करें। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कई दिनों तक वह मारे-मारे घूमते रहे। भारतीय कामगारों की रहमोकरम पर वह जिंदा तो रहे, लेकिन घुटनभरी जिंदगी ही जीते रहे। इसके बाद उन्होंने भारतीय दूतावास से शिकायत की। इसके बाद अकामा(निवास प्रमाण) न होने पर राजधानी रियाद से उन्हें जेल भेज दिया गया। यह उनका सबसे भयावह दिन था। गनेश ने बताया कि छह दिसंबर को जब उनको सलाखों के पीछे ले जाया गया तो लगा कि अब सबकुछ खत्म हो गया। वह वापसी की उम्मीद ही छोड़ चुके थे। 12 दिन तक कैद में रखने के बाद सऊदीअरब की सरकार ने उनको वापस भेजा है।