भरवारी। हूबलाल संस्कृत स्कूल में नवनिर्मित मंदिर में शुक्रवार को मंगलमंत्रों के बीच मां भवानी विराजीं। हवन-पूजन के साथ प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा ज्योर्तिमठ बद्रिकाश्रम के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कराई। इस दौरान प्रवचन करते हुए उन्होंने मानवता को अंगीकार करने का गुरुमंत्र भी दिया। धर्मांतरण और घरवापसी जैसे मुद्दे पर सिर्फ इतना बोले कि धर्म जातियों से नहीं होता है। धर्म वही है जो मानवता की सीख दे।
भरवारी स्थित संस्कृत स्कूल में दो दिनों से माता का जयकारा गूंज रहा है। नवनिर्मित मंदिर में मां जगदंबे की प्राण प्रतिष्ठा के लिए बृहस्पतिवार को जहां कस्बे में भव्य शोभायात्रा निकाली गई थी। वहीं शुक्रवार को हवन-पूजन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर में मां की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई। ज्योर्तिमठ बद्रिकाश्रम के जगद्गुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती महराज ने मंगलमंत्रों के बीच मां जगदंबे को मंदिर में विराजमान किया। इस दौरान उन्होंने प्रवचन करते हुए लोगों को मानवता की शिक्षा-दीक्षा भी दी।
कहाकि सभी धर्मों का एक ही सार है मानवता की रक्षा हो। देश में इस समय मुद्दा बने धर्मांतरण और घरवापसी के सवाल पर पहले तो उन्होंने कुछ भी बोलने से मना किया। फिर कहाकि जाति से किसी धर्म की कोई पहचान नहीं होती है। धर्म वही है, जो मानवता की शिक्षा दे। स्वेच्छा से कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म-पंथ को अंगीकार कर सकता है। इसमें किसी भी तरह की कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। इस मौके पर हूबलाल संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य मुरलीधर मिश्र, शंकरलाल, मनोज कुमार, लालमनि देवी आदि मौजूद रहे।