जिले के चार हजार हैंडपंप कमीशनखोरी का शिकार हो गए। रुपये बचाने के चक्कर में ठेकेदार मनमानी करते रहे और अफसर अनदेखी। मानक के हिसाब से बोरिंग नहीं कराई गई। यही कारण है कि एक साल भी हैंडपंप नहीं चल सके और ठप हो गए। अब इन हैंडपंपों की रिबोरिंग के लिए बजट का इंतजार किया जा रहा है।
जिले के लोग गर्मी के दिन में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते हैं। माननीयों ने पेयजल संकट से निजात दिलाने के लिए बड़ी संख्या में हैंडपंप लगवाए। माननीयों की मंशा थी कि ग्रामीणों को पेयजल आसानी से मिल सके, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जल निगम के ठेकेदारों ने कमीशनबाजी के चक्कर में ऐसा खेल खेला कि हैंडपंप तो जगह-जगह दिख रहे हैं, लेकिन पानी फिर भी मयस्सर नहीं है। हैंडपंप की रकम बचाने के लिए ठेकेदार बोरिंग के मानकों से खिलवाड़ करते रहे।
सौ-सौ फिट में बोरिंग करा दी गई, जबकि भू-जल स्तर इससे काफी नीचे है। यही कारण है कि 24 हजार हैंडपंपों में लगभग चार हजार हैंडपंप ठप हो गए हैं। तीन हजार से ज्यादा ऐसे हैंडपंप हैं, जो बीच-बीच में पानी छोड़ देते हैं। रिबोर लायक हैंडपंपों का आंकड़ा जल निगम के अधिकारियों के पास आ चुका है। हैंडपंप रिबोर के लिए जल निगम ने कवायद की थी, लेकिन उसे समय रहते बजट नहीं मिला। गर्मी के दस्तक देते ही गांवों से शिकायत आने लगी तो निगम ने एक बार फिर तेजी दिखाई। जल निगम ने रिबोर के लिए बजट की मांग की है।