मंझनपुर। गंगा-यमुना कछार में बसा कौशाम्बी में अमरूद के हजारों बगीचे भी हैं। 3460 बीघे के रकबे में फैले बागों में प्रतिवर्ष 1.50 लाख कुंतल से भी अधिक अमरूद की पैदावार होती है। इनमें लाल रंगत वाला सेबिया किस्म के अमरूद की तो पूरे देश में अलग ही पहचान है। इस अमरूद को देशवासी इलाहाबादी अमरूद के नाम से जानते हैं, जबकि यह अमरूद कौशाम्बी का है। पर, अलग जिला बनने के बाद भी जिले को इस अमरूद के नाम पर पहचान नहीं मिल सकी है।
बता दें कि औद्योगिक रूप से सिफर कौशाम्बी में 90 फीसदी लोगों की जीविका खेती पर निर्भर है। गेहूं, धान की खेती के अलावा जिले में बागवानी भी बड़े पैमाने पर होती है। इनमें सबसे ज्यादा बाग अमरूद की है। उद्यान विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में अमरूद की बाग 865 हेक्टेयर यानि 3460 बीघे में फैली है। इनमें देशी किस्म के अलावा सेबिया, सुरखा, सफेदा, ललित और लखनऊ-49 प्रमुख किस्में हैं।
इनमें कौशाम्बी में बहुतायत पैदा होने वाला सेबिया किस्म का अमरूद तो अपनी विशेष लाल रंगत और लाजबाव स्वाद के कारण पूरे देश में अलग ही पहचान रखता है। पर, कौशाम्बी के लोगों को छोड़ दें, तो आसपास के अन्य जनपदों के साथ ही दूसरे राज्यों के लोग इस लाल रंगत वाले सेबिया अमरूद को इलाहाबादी अमरूद के रूप में ही जानते-पहचानते हैं। यहां के बागवान, किसान बताते हैं कि इस अमरूद को इलाहाबादी पहचान तब मिली थी, जब कौशाम्बी इलाहाबाद का ही हिस्सा था। पर, अलग जिला बनने के 18 साल बाद भी इसे कौशाम्बी के अमरूद के रूप में पहचान नहीं मिल सकी है।
सेबिया को इलाहाबाद के बजाय कौशाम्बी के अमरूद के रूप में पहचान मिले। इसकी कवायद दो साल पहले तत्कालीन जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने की भी थी। उन्होंने दूसरे राज्यों में भेजे जाने वाले अमरूद की पैंकिंग कौशाम्बी ब्रांड के रूप में कराने की पहल की थी। व्यापारियों, बागवानों से इस काम में सहयोग का आह्वान भी किया था। पर, यह पहल भी सिर्फ खानापूर्ति तक ही सिमटी रही। इतना ही नहीं कभी यहां के जनप्रतिनिधियों ने भी इस दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया। इसके कारण कौशाम्बी की यह पहचान अब भी इलाहाबादी बनी हुई है।
कौशाम्बी में अमरूद की बागवानी से और किसान जुड़े। यहां के फल से जिले को पहचान मिले। इस तरफ उद्यान विभाग के अफसर तनिक भी गंभीर नहीं है। यही कारण है कि जिले में अमरूद के किसान और बागवान को बागवानी का फायदा नहीं मिल पाता है। ऐसे ही किसानों की मेहनत का सारा मुनाफा फल व्यापारी कमाते हैं।
अमरूद की एक हेक्टेयर बाग की लागत करीब 42 हजार रुपये आती है। जिला उद्यान अधिकारी राम सिंह यादव ने बताया कि एक हेक्टेयर नई बाग में कुल 280 पौध लगते हैं। इन पौधों को तैयार करने में लगभग 42 हजार रुपये की लागत आती है। इन पौधों से दो साल के बाद फल आने लगते हैं। करीब पांच साल पुरानी एक हेक्टेयर बाग से प्रतिवर्ष 140-160 कुंतल फल मिलता है।