सीआरपीएफ जवान चंद्रमणि यादव की शहादत पर पूरा गांव गमगीन था। आखिरी दीदार को उसके घर के सामने जुटे हजारों लोगों की जुबान में बस सपूत की शहादत के ही किस्से थे। गांव-गांव का एक-एक व्यक्ति बस चंद्रमणि के साथ गुजारे पल ही याद कर रहा था। इसमें गांव के बड़े-बुजुर्ग, महिलाएं और शिक्षक भी शामिल रहे। सभी बस यही कहते सुने गए कि देश के लिए शहीद होना तो गर्व की बात है। शहादत को बड़े नसीब वालों को नसीब होती है। चंद्रमणि के शिक्षक रघुनंदन सिंह और रामराज पांडेय भी उसकी यादों में खोए रहे। आंखों में आंसू लेकर शिक्षक रघुनंदन तो बस यही कह सके कि नक्सलियों ने उनसे उनका प्रिय शिष्य छीन लिया।
जवान बेटे की हमेशा के लिए जुदाई किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा दुख है। यही गम नक्सलियों ने पूरे अयोध्या गांव के मानसिंह और उनकी पत्नी को दिया है। चार बच्चों में सबसे बड़े चंद्रमणि उर्फ ललनजी की मौत से मानसिंह भी खुद को फफकने से रोक नहीं सके। बेटे की मौत से बुत बनी पत्नी को समझाने की कोशिश करते समय भी वे अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। इन सबके बीच उन्होंने कहाकि देश के लिए अभी उनके पास दो बेटे और हैं। ईश्वर करे, सबको ललनजी जैसा सपूत दे।
कौशाम्बी के पूरे अयोध्या गांव के सीआरपीएफ जवान चंद्रमणि यादव की शहादत पर पूरे इलाके को गर्व है। स्थानीय व्यापारियों ने सपूत के सम्मान में दो दिन से चरवा बाजार बंद कर रखी है। बता दें कि शहीद के पार्थिव शरीर को सोमवार गांव आने की सूचना थी। इस पर सोमवार को ही चरवा के व्यापारी बाजार बंद करके सपूत के अंतिम दर्शन को दिनभर घर के सामने डटे रहे। पर, खराब मौसम के कारण सोमवार को पार्थिव शरीर नहीं आ सका। इधर, पार्थिव शरीर मंगलवार को गांव आया, तो सपूत के सम्मान में मंगलवार को भी दुकानदारों ने अपनी-अपनी दुकानें नहीं खोली।