फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शिक्षा के साथ पर्यावरण का सुखद संदेश दे रहे शिक्षक अजय

विज्ञापन
enviroment - फोटो : KAUSHAMBI
विज्ञापन
कड़ा। पर्यावरण और किसान मित्र कही जाने वाली गौरया शिक्षक अजय साहू के घर-आंगन में सारा दिन चीची करती रहती है। गौरया की विलुप्त हो रही प्रजापित को संरक्षण देना एक दशक पहले शिक्षक की मां ने शुरू किया। मां के देहावसान के बाद शिक्षक का परिवार गौरया की सेवा कर रहा है। मौजूदा समय पांच सौ के करीब गौरया शिक्षक के यहां घोंसला बनाकर रहती है। परिवार के सदस्य उनके लिए दाना-पानी का इंतजाम करते हैं।
विज्ञापन

गौरया किसानों के लिए पर्यावरण मित्र है। वह फसलों में लगने वाले कीटों को खाती है। इससे किसानों की फसल अच्छी होती है। पिछले दो दशक से गौरया विलुप्त सी होती जा रही है। वन विभाग की रिसर्च टीम इस पर खोज कर रही है। सरकार की तरफ से गौरया के संरक्षण को लेकर गौरया दिवस मनाया जाता है। जिसमें लोगों को गौरया के लिए घर की मुंडेर पर खाना-पानी रखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इसी कड़ी में कड़ा विकास खंड के सौरई बुजुर्ग निवासी शिक्षक अजय साहू का परिवार भी एक दशक से काम कर रहा है। अजय की मां राम जानकी साहू को गौरया से बेहद लगाव था। वह घर में निवास करने वाली गौरया की खूब सेवा करती थी। पूजा-पाठ के बाद उनका पहला काम गौरया के लिए पानी और कभी दाल चावल तो कभी दूध चावल रखना होता था। 2017 में उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी निभा रही है शिक्षक की पत्नी शशि साहू। सास के नक्शे कदम पर चलकर वह बेसन के सेव, मूंगफली, मौसमी फल आदि मुंडेर पर रखती हैं। पानी के पात्र कभी खाली नहीं होने पाते। अजय साहू बताते हैं उन्होंने घर के बागीचे में झाड़ वाली लता लगा रखी है। जिससे गौरया को घोंसला बनाने में मदद मिले। मौजूदा समय में पांच सौ के करीब गौरया उनके यहां होगी। गौरया के घोसलों में इन दिनों अंडे भी हैं। सारा दिन वह कभी आंगन तो कभी कमरों की ताड़ पर खेलती रहती है।
विज्ञापन

आदर्श शिक्षक का मिला है दर्जा
कड़ा। सौरई बुजुर्ग प्राथमिक स्कूल में बतौर प्रधानाध्यापक तैनात अजय साहू को आदर्श शिक्षक का दर्जा मिला है। उन्होंने अपने पैसे से स्कूल के बच्चों के लिए कम्प्यूटर क्लास की व्यवस्था कराई। इसके अलावा फर्नीचर, बच्चों के लिए स्टेशनरी, टाई-बेल्ट की व्यवस्था वह अपने पैसे से करते हैं। हर साल स्कूल के टॉपर बच्चों को सम्मानित किया जाता है।
गौरया की विलुप्त हो रही प्रजाति को लेकर सरकार प्रयास कर रही है। इसी कारण हर साल गौरया दिवस मनाया जाता है। गौरया पर्यावरण को बायोडायबिस्टी से बचाती है। वह फसलों में लगने वाले कीट को खाती है। इससे किसानों को कीट नाशक का प्रयोग नहीं करना पड़ता था। गौरया किस कारण से विलुप्त हो रही है, इस पर विभाग रिसर्च करा रहा है।
विज्ञापन

पीके सिन्हा, डीएफओ
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें