वन विभाग द्वारा कराए गए प्लांटेशन पर तैनात वॉचर मजदूरी कर रहे हैं। वहीं मजदूरों के हिस्से की रकम अधिकारी खा रहे हैं। इतना ही नहीं वॉचरों की दिहाड़ी में 25 प्रतिशत हर माह कटौती भी की जाती है। अधिकारी के इस खेल से वन विभाग में तनातनी का माहौल बन गया है। मातहत अधिकारी भी इससे परेशान हैं।
जिले में वन विभाग द्वारा हर साल बड़े क्षेत्रफल में पौधरोपण कराया जाता है। रोपे गए पौधों की देखभाल करने के लिए प्रत्येक प्लांटेशन स्थल पर तीन साल के लिए विभाग द्वारा वॉचर तैनात किया जाता है। वॉचर की जिम्मेदारी होती है कि वह पौधों को पालतू और जंगली जानवरों के नुकसान से बचाए। मौजूदा समय में जिले भर में लगभग 60 वॉचर तैनात हैं। आरोप है कि प्रभागीय वनाधिकारी कार्यालय में तैनात एक लिपिक द्वारा इन वॉचरों से देखभाल के अलावा पौधों की निराई, गुड़ाई, सिंचाई का काम भी कराया जा रहा है। बाद में इस काम को मजदूरों के हिस्से में दिखाकर भुगतान कर लिया जाता है। वॉचरों की माने तो उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से मिल रहे 141 रुपये में से भुगतान के समय 25 प्रतिशत की कटौती लिपिक द्वारा कर ली जाती है। यदि किसी ने इसका विरोध किया तो उसका भुगतान रोक दिया जाता है। डीएफओ ओपी अम्बस्ट का कहना है कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है।
डिप्टी रेंजर सहित कई कर्मचारियों का रोक रखा है वेतन
प्रभागीय वनाधिकारी की कार्यशैली की चर्चा कार्यालय से लेकर रेंज आफिस तक में फैली है। अफसर की मर्जी के मुताबिक न चलने पर उनका वेतन रोक दिया गया है। इसमें डिप्टी रेंजर, वाहन चालक से लेकर कई मातहत शामिल हैं। अधिकारी की कार्यशैली से क्षुब्ध कर्मचारी अब उनके कारनामों को मजबूर होकर आम कर रहे हैं। हद तो तब हो गई जब अधिकारी के चालक ने प्राइवेट वाहन चलाने से इनकार किया तो उसे पैदल करते हुए वेतन भुगतान पर रोक लगा दी।
वन विभाग में यदि इस तरह की गड़बड़ी हो रही है तो इसकी जांच कराई जाएगी। वॉचरों से काम कराकर मजदूरी का भुगतान कराया गया है तो मामला गंभीर है। प्रकरण की जल्द से जल्द जांच करवाई की जाएगी।
अखंड प्रताप सिंह, डीएम