कौशाम्बी ब्लाक के असाढ़ा गांव में कुपोषण की शिकार 19 माह की तमन्ना ने शनिवार सुबह दम तोड़ दिया। तमन्ना का तीन महीने से इलाज चल रहा था। कुपोषित होने के कारण वह सूख कर कांटा हो चुकी थी। उसका वजन मानक से आधा था। कुपोषित बच्ची को सरकारी लाभ नहीं मिल रहा था। आंगनबाड़ी केंद्र से भी मिलने वाली सुविधाओं से वह वंचित थी।
असाढ़ा निवासी गुलाम वारिस व उसकी पत्नी रेशमा बेगम बीड़ी मजदूर हैं। गुलाम वारिस की 19 माह की बेटी तमन्ना कुपोषण का शिकार थी। नवंबर माह में उसका वजन चार किलो था जबकि होना आठ किलो दो सौ ग्राम चाहिए था। तमन्ना का जन्म के बाद ही वजन कराया गया था। उस वक्त वह आंशिक कुपोषण की शिकार थी। इस पर उसको फैजीपुर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र से लिंक कर दिया गया था। मगर डेढ़ किमी दूर स्थित फैजीपुर आंगनबाड़ी केंद्र से तमन्ना को मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिल रही थीं। तीन महीने से उसकी हालत खराब थी। उसका वजन दिन ब दिन कम होता जा रहा था। दो दिन पहले उसे बुखार आया। शनिवार सुबह तमन्ना ने घर में ही दम तोड़ दिया।
तमन्ना की मौत से परिजनों में हाहाकार मचा है। उसकी बीमारी की जानकारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने अधिकारियों को दी थी। इसके बाद भी तमन्ना को जिला अस्पताल में संचालित एनआरसी केंद्र नहीं भेजा गया। जिसका परिणाम रहा कि उसने दम तोड़ दिया। तमन्ना की बड़ी बहन अलकमा (27 माह) भी कुपोषित है। उसकी भी स्थिति ठीक नहीं है। असाढ़ा में कुपोषण का शिकार अलकमा अकेले नहीं है। गांव के लगभग 77 बच्चे इस बीमारी से ग्रस्त हैं। इनमें 22 अति कुपोषित और 55 बच्चे आंशिक कुपोषण का शिकार हैं। कुपोषित बच्चों की जानकारी अधिकारियों को है। इसके बाद भी वे संजीदा नहीं हैं।
डेढ़ साल में असाढ़ा के 14 मासूमों को निगल गया कुपोषण
कुपोषण असाढ़ा गांव मासूमों को निगल रहा है। डेढ़ साल में इस गांव के 14 बच्चों की मौत हो चुकी है। कुपोषण से निपटने के लिए सरकार ने तगड़े बंदोबस्त कर रखे हैं, लेकिन असाढ़ा गांव के कुपोषित बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। मौत का शिकार हुए आधा दर्जन बच्चे ऐसे थे जिनका नामकरण तक नहीं हो सका था।
असाढ़ा गांव की आबादी 2900 है। यहां एक ही आंगनबाड़ी केंद्र है। मानक के हिसाब से यहां तीन आंगनबाड़ी केंद्र होने चाहिए। गांव के 77 बच्चे कुपोषित व अति कुपोषित हैं। यह बच्चे जीते-जागते कंकाल हैं। खून की कमी से यह जूझ रहे हैं। पौष्टिक भोजन न मिलने से इन बच्चों की सांसें दिन ब दिन कम हो रही हैं। वर्ष 2016 में इस गांव के कहकशा पुत्री अब्बास अली, अनुराधा पुत्री नकुल, आरती पुत्री अशोक और हर्ष पुत्र जैकी की मौत हुई। इनके अलावा आधा दर्जन ऐसे बच्चों की मौत हुई जिनका नामकरण भी नहीं हो पाया था। इनमें अर्जुन की बेटी, संतोष का बेटा, तोता का बेटा, शिवनरेश की बेटी, धीरेंद्र का बेटा, रामकृपाल की बेटी थी। पिछले साल दस बच्चों की मौत हुई, जबकि इसी अप्रैल माह में गुलकसा पुत्री तौफीक, मनोज कुमार की बेटा, संतोष कुमार के बेटे की मौत हुई। शनिवार को तमन्ना ने दम तोड़ दिया तो गांव के लोग आक्रोशित हो गए। ग्रामीणों का कहना है कि हौसला पोषण मिशन योजना का लाभ नहीं मिला। आंगनबाड़ी केंद्र से जो सुविधाएं मिलती हैं, वह अब तक उनको नहीं मिली है। महीने में एक दिन एएनएम सिम्पा आती है और टीकाकरण कर चली जाती है। ग्रामीणों का सवाल है कि एक दिन में 2900 की आबादी वाले इस इलाके में एएनएम टीकाकरण कैसे कर सकती है। कई बार इसकी शिकायत की गई है, लेकिन बैशकांटी उपकेंद्र के डॉक्टर ध्यान नहीं दे रहे हैं।