गांवदारी और परिवारों की आपसी रंजिश में कई जिंदगियां तबाही के कगार पर पहुंच गई हैं। निकाह के बाद लड़कियों की विदाई नहीं हो सकी या फिर विदाई हुई तो वापस लड़की को मायके भेज दिया गया। तलाक के इंतजार में तमाम जिंदगियां पिस रही हैं। उनका कोई हल नहीं निकल पा रहा है।
करारी क्षेत्र की एक गांव की कहकशां (नाम परिवर्तित) का निकाह 2005 में हुआ। उस वक्त कहकशां की उम्र महज 13 साल थी। दो परिवारों में रिश्तेदारी थी। ऐसे में उनके बीच नया रिश्ता हो गया। निकाह के दौरान तय हुआ कि बालिग होने पर लड़की की विदाई होगी। मगर गुजरते वक्त के साथ गांवदारी को लेकर दोनों परिवार आमने सामने हो गए। तनातनी बढ़ती गई। पुरानी और नई रिश्तेदारी को भूल दोनों परिवार एक दूसरे को नीचा दिखाने पर आमादा हो गए।
कहकशां को क्या मालूम की मायके और ससुराल वालों का झगड़ा उसकी जिंदगी को बर्बाद कर देगा। दोनों परिवार ने एक दूसरे पर मुकदमा दर्ज करा दिया। कहकशां प्यादा बनकर रह गई। मायका पक्ष ने दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया तो ससुराल पक्ष ने मारपीट का। दोनों परिवार में रंजिश बढ़ती गई। अब कहकशां 24 साल की हो गई है। वह अपने पति के पास जाना चाहती है, मगर दोनों परिवार की रंजिश उसे कहीं का नहीं रहने दे रही। रविवार को दोनों पक्षों में बातचीत के दौरान सुलह-समझौते की गुंजाइश बनी है।
हालांकि सुलह तलाक की शर्त पर होगी। यानि 11 साल से जिस शख्स को कहकशां अपना पति मान कर बैठी थी, अब उसके साथ शादीशुदा जिंदगी बिताने के बजाए उसे तलाक मिलेगा। ताकि वह दूसरी शादी कर सके। पहले भी उसके परिवार वालों ने तलाक की गुजारिश की थी। मगर ससुराल के लोग तलाक न देकर अपनी मनमानी किए जा रहे थे और कहकशां घुट-घुट कर जीने को मजबूर थी। ये केवल एक कहकशां की आपबीती नहीं है। ऐसी तमाम लड़कियां हैं जो पारिवारिक रंजिश के चलते अपने पति के बगैर जिंदगी गुजार रही हैं। और तलाक का इंतजार कर रही हैं।
शरीयत के लिहाज से अगर लड़का एक बार भी तलाक कह दे तो शादी टूटी मानी जाएगी। हालांकि इसके लिए जरूरी है कि दोनों के बीच तीन महीने तक संबंध न बने। शादी टूटने के लिए तलाक जरूरी है। इसके बाद ही लड़की की शादी दूसरी जगह की जा सकती है।
हबीब उल्ला, मुफ्ती, मदरसा जामिया इम्दादुल ऊलूम करारी