स्वच्छ भारत मिशन अंतर्गत जिले को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए शासन का 79 करोड़ दो साल में खर्च हो चुका है। अफसरों ने डेढ़ सौ गांवों को खुले में शौच से मुक्त होने की घोषणा भी कर अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी है जबकि हकीकत यह है कि ओडीएफ घोषित गांवों के लोग अभी भी खुले में शौच जाते हैं। ऐसे लोगों ने नोडल अफसरों व ट्रिंगरिंग टीम की मेहनत पर पानी फेर रखा है।
गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए केंद्र सरकार पानी की तरह पैसा खर्च कर रही है। दो अक्टूबर वर्ष 2014 से लेकर अब तक जिले की 409 ग्राम सभाओं में शासन द्वारा 79 करोड़ 20 लाख रुपये 66 हजार शौचालयों के लिए दिया जा चुका है। ग्राम सभाओं को रुपया देने के बाद जिला पंचायत राज अधिकारी कमल किशोर द्वारा जिला स्तरीय अधिकारियों को नोडल अधिकारी नामित कर लगाकर शौचालय निर्माण की मानीटरिंग कराई जाएगी।
ग्रामीण खुले में शौच न करें इसके लिए ट्रिंगरिंग टीम गांवों में उतारकर लोगों को समझाया जा रहा है। अब तक अफसरों की टीम लगाकर 149 गांवों में घर-घर शौचालय बनवाकर उन्हें ओडीएफ का दर्जा दे दिया गया है। बावजूद इसके लिए इन गांवों को खुले में शौच से मुक्त नहीं किया जा सका। प्रत्येक दिन सुबह और शाम ग्रामीण खुले में शौच कर रहे हैं। ग्रामीणों की इस फितरत के आगे जिले की ओडीएफ टीम भी बौनी साबित हो रही है। इससे साफ हो गया है कि जिले में घर-घर शौचालयों का निर्माण भले करा दिया जाय पर खुले में शौच से मुक्त करने के लिए लोगों की सोच बदलने तक इंतजार करना पड़ेगा।
मॉडल गांव के लोग कर रहे खुले में शौच
सदर ब्लॉक के बबुरा गांव को पंचायती राज विभाग ने सबसे पहले ओडीएफ घोषित किया था। यहां पर पूर्व डीएम अखंड प्रताप सिंह ने स्वयं ट्रिंगरिंग टीम के साथ सुबह और शाम मार्निंग फालोअप करने कई दिन पहुंचे। घर-घर शौचालय निर्माण होने के बाद पंचायती राज विभाग ने इन गांवों को मॉडल का दर्जा दे दिया। बावजूद इसके ग्रामीणों की सोच नहीं बदल सकी। डीएम आवास के ठीक बगल स्थित ओडीएफ गांव में जब खुले में शौच नहीं बंद हो सका तो अन्य गांवों का क्या हाल होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।