भरवारी नगर पालिका का चमंधा गांव आंसुओं के सैलाब में डूबा हुआ है। छह दिन के अंदर चार श्रमिकों की मौत के गम से लोग उबर नहीं पाए हैं। कई घरों में चूल्हे नहीं जले।
भरवारी के खल्लाबाद स्थित पटाखा फैक्टरी के हादसे में झुलसे चमंधा के सोनेलाल पुत्र छोटेलाल और हरिलाल पुत्र देवतादीन ने उसी दिन दम तोड़ दिया था। गांव के मुन्नालाल पुत्र कल्लू और हरिलाल का बेटा मुकेश घायल थे, जिनका प्रयागराज के एसआरएन में उपचार चल रहा था।
सोमवार को सोनेलाल और हरिलाल की अर्थी को कंधा देने के बाद लोग अन्य दोनों घायलों की जल्द ठीक होने की कामना कर रहे थे। घटना के तीसरे मंगलवार को मुन्नालाल की मौत की खबर पहुंच गई। फिर से हर तरफ रोने और चीखने की आवाजें गूंजने लगीं। बुधवार को मुन्नालाल के शव का अंतिम संस्कार हुआ।
किसी तरह ग्रामीणों ने उसके परिजनों को ढांढ़स बंधाया। मातमी चीखें धीरे-धीरे सिसकियों में तब्दील होने लगी थीं। लोगों को लगा कि शायद अब माहौल बदले और शोक में डूबे परिजनों को संभलने का मौका मिले। इसी बीच बृहस्पतिवार को चौथे श्रमिक मुकेश की मौत की दुख भरी खबर आ गई।
भाई को याद कर बेसुध हुई बहन, मां भी बेहाल
मंझनपुर। मुकेश के घर में छह दिन से चूल्हा नहीं जला। पिता के बाद भाई की मौत की खबर सुनकर बहन प्रीती, रिंकी का रो-रोकर हाल बेहाल है। मां मंजुला देवी के आंसू भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। रिंकी तो रह-रह कर बेहाश हो रही थी। 10 साल के भाई विवेक और 14 साल के अभिषेक समेत परिवार के अन्य बच्चों को आसपास के लोगों ने भोजन कराया।
बेटे को खोजने खेतों की ओर जा रही थी मां
भरवारी के बैरिहा निवासी राजेंद्र की मौत की खबर बृहस्पतिवार को ही आ गई थी। पिता राजेश बेटे का शव लेने प्रयागराज चले गए। वहीं मां कमला देवी घर के चिराज को याद कर आंसू बहाती रही। बार-बार वह अपना सुध-बुध खो रही थी। बेटे को खोजने के लिए खेतों की तरफ जा रही थी। किसी तरह गांव की महिलाओं ने उसे संभाला। अर्थी बनी रखी रही। ताकि, अंतिम संस्कार में देर न हो जाए।