स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति की बयार बह रही है। हर घर तिरंगा लगाने पर जोर है। तिरंगे की मांग भी बढ़ी है। लेकिन स्वदेशी के बाजार में सन्नाटा है। मंझनपुर कस्बे में खादी की दो दुकानें हैं। दोनोंं से अब तक केवल सात खादी के तिरंगों की ब्रिकी हुई है। जबकि सिंथेटिक कपड़ों से बने हजारों झंडे लहरा रहे हैं।
खादी सिर्फ एक उत्पाद नहीं, विचार है। आत्मनिर्भरता की पहचान है। लेकिन बाजार में इसकी कोई पूछ नहीं। जश्न-ए-आजादी के मौके पर सरकार की ओर से भी इसे आगे बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। महंगाई ने इसे आम जनता से दूर कर दिया।
जिले के 48 स्वयं सहायता समूहों को तिरंगा बनाने का ऑर्डर मिला है। इन समूहोंं को तीन लाख दो हजार तिरंगा बनाना था। केवल 10 फीसदी तिरंगा बनाना ही शेष बचा हैं। स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के मुताबिक, ज्यादातर झंडे साटन के बने हैं।
एनआरएलएम के जिला मिशन प्रबंधक दिव्यांशु सिंह ने बताया कि जिन 48 समूहों को तिरंगा बनाने का ऑर्डर मिला है। उनको किस कपड़े का प्रयोग करना है। इसकी कोई बाध्यता नहीं है। समूह तिरंगा बनाने के लिए कॉटन के अलावा टेरीकॉट, रोटो व साटन का प्रयोग कर रहे हैं।