मंझनपुर। दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंककर पीता है। यह कहावत डायट पर सटीक बैठ रही है। बीटीसी चयन 2012 में फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद संस्थान ने अब बीटीसी चयन 2013 की भी जांच शुरू कर दी है। प्रशिक्षुओं के शैक्षिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए टीमें गठित की गई हैं। कागजातों को जांच के लिए डाक से न भेजकर प्रवक्ता खुद लेकर बोर्ड और विश्वविद्यालय जाएंगे।
दिल्ली उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद और सेंटर आरए बोर्ड अजमेर नई दिल्ली से जाली मार्कशीट से बीटीसी चयन 2012 में फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद डायट प्रशासन जागा है। प्राचार्य ने बताया कि बीटीसी चयन 2013 की भी जांच शुरू की गई है। प्रवक्ता अनिरुद्ध श्रीवास्तव के नेतृत्व में प्रशिक्षुओं के शैक्षिक कागजातों के सत्यापन के लिए टीमें गठित की गई हैं। इस बार सत्यापन की जिम्मेदारी प्रवक्ताओं को दी गई है।
प्रमाण पत्रों को सत्यापन के लिए डाक से न भेजकर प्रवक्ता खुद कागजात लेकर बोर्ड और विश्वविद्यालय जाएंगे, ताकि रत्ती भर गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे। यदि पारदर्शिता के साथ शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन हुआ तो बड़ी संख्या में प्रशिक्षुओं का फंसना तय है। सूत्रों की माने तो डायट और संबद्ध निजी कालेजों में 60 फीसदी प्रशिक्षुओं का चयन फर्जी मार्कशीट के माध्यम से हुआ है। डायट में सक्रिय फर्जीवाड़े के रैकट के सरगना ने प्रशिक्षुओं को चयन, सत्यापन और वेतन लगवाने तक की गारंटी दी है। मामले में प्राचार्य नरेंद्र शर्मा का कहना है कि एक-एक प्रशिक्षुओं के शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन पूरी पारदर्शिता से कराया जाएगा। फर्जीवाड़ा सामने आने पर चयन रद्द करके संबंधित प्रशिक्षुओं पर एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक और बीएड की जाली मार्कशीट से थोक में बीटीसी और विशिष्ट बीटीसी में प्रशिक्षुओं ने चयन करा लिया है। इससे पहले तमाम लोगों ने प्रशिक्षण लेकर नौकरी भी हासिल कर ली है। डायट प्राचार्य ने बताया कि आगरा यूनिवर्सिटी की अंकपत्रों पर उनकी विशेष नजर है। एक-एक शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन बारीकी से कराया जाएगा। पकड़े जाने पर प्रशिक्षुओं को कतई बख्शा नहीं जाएगा।
पूर्व प्राचार्य प्रेमप्रकाश मौर्य के कार्यकाल में बीटीसी चयन में बड़े पैमाने पर डायट में फर्जीवाड़ा किया गया है। इस दौरान फतेहपुर के रैकेट को डायट में पनाह मिली थी। जालसाजों की लक्जरी गाड़ियों में प्राचार्य सैर सपाटा करते थे। इसका खामियाजा कौशाम्बी के अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ रहा है। मेहनत से पढ़ाई करने के बाद भी फर्जीवाड़े के कारण उनका चयन बीटीसी में नहीं हो सका है। पूर्व प्राचार्य ने जिला प्रशासन को झूठी सूचनाएं देकर गुमराह किया है। जैसे फर्जी बीटीसी चयन 2012 में प्रशिक्षुओं का फर्जी सत्यापन आने के बाद भी मामले को दबा दिया गया था। बदले में मोटी रकम की वसूली की गई थी।