अक्षय तृतीया के मौके पर होने वाले वाल विवाह पर इस बार प्रशासन की पैनी नजर रहेगी। इस पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासनिक अफसरों ने जिले भर में नजरें लगा दी हैं। कहीं भी बाल विवाह की भनक लगी तो मौके पर पहुंचकर पुलिस और प्रशासन के लोग उसे रोकने का काम करेंगे। नहीं मानने वालों को सलाखों के पीछे भेजने से नहीं चूकेंगे।
शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े दोआबा में बाल विवाह एक प्रथा के रूप में फैल चुकी है। लोगों में बाल विवाह को लेकर 80 फीसदी सुधार देखने को मिल रहा है लेकिन कुछ तबके के लोग आज भी अपने बेटे और बेटियों की शादी 15 से 16 साल के बीच कर देते हैं।
इसे लेकर शासन ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 में पारित किया था लेकिन नौ साल बाद भी इसे ठीक से अमल में नहीं लाया जा सका है। अब मामले को शासन ने गंभीरता से लिया है। निदेशालय महिला कल्याण उत्तर प्रदेश ने जिला प्रशासन को पिछले दिनों पत्र जारी कर बाल विवाह पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी किया। पत्र मिलने के बाद डीएम अखंड प्रताप सिंह ने अक्षय तृतीया के दिन संभावित बाल विवाह कार्यक्रमों पर पैनी नजर रखने का निर्देश मातहतों को दिया है। कहा है कि यदि समझाने के बाद भी किसी के परिजन न माने तो उनके खिलाफ सख्ती से पेश आएं। डीएम के निर्देश के बाद 9 मई सोमवार को जिले भर में बाल विवाह के कार्यक्रमों पर प्रशासन की पैनी नजर रहेगी।
दोआबा में अक्षय तृतीया के मौके पर होने वाले बाल विवाह को प्रशासन एक कुरीति मान रहा है। समाज में फैली इस कुरीति को समाप्त करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। जागरूकता कार्यक्रम की जिम्मेदारी का निर्वहन जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा किया जाएगा। इसके तहत गांवों में कार्यक्रम का आयोजन कर लोगों को बाल विवाह से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दी जाएगी। लोगों को यह भी बताया जाएगा कि विवाह के समय बेटों की उम्र 21 और बेटियों की 18 से कम नहीं होनी चाहिए।
बाल विवाह को समाज में पुनीत कार्य माना जाता था। दो दशक पहले तक कन्या की शादी नौ साल पूरा होते-होते कर दी जाती थी। मान्यता थी कि कन्यादान महादान होता है। इसका फल बेटी की नौ वर्ष की उम्र तक ही मिलता है। पुण्य कमाने के चक्कर में लोगों ने बाल विवाह को प्राथमिकता दी थी लेकिन दो दशक से इसमें धीरे-धीरे सुधार आना शुरू है।