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ऑपरेशन विजय के विजेता को पिता ने भरा था जोश

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ऑपरेशन विजय के विजेता में पिता ने भरा था जोश
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पिता ने पत्र भेजकर डटकर पाक का मुकाबला करने का दिया था संदेश
फोटो नं-
अमर उजाला ब्यूरो
कोखराज। कारगिल में हुए ऑपरेशन विजय की सफलता के गवाह रहे हवलदार दशरथ सिंह की आंखों में आज भी उन लम्हों को याद कर पानी आ जाता है। एक तरफ परिवार था और दूसरी तरफ पिता इंद्रनरायण का जोश भर देने वाला पत्र। दशरथ का कहना है कि पिता का संदेश पाने बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नही देखा और बेहद कम नुकसान के बाद कारगिल पर विजय हासिल कर ली।
सदर तहसील के चक थाम्भा गांव निवासी हवलदार दशरथ लाल 18 जनवरी 1980 में सेना का हिस्सा बने। 18 ग्रेनेडियर्स में शामिल रहे दशरथ ऑपरेशन विजय का हिस्सा बनेे। कारगिल विजय करने के बाद दशरथ लाल को प्रशंसा पत्र दिया गया। उन्हें आर्मी कमान्डर प्रशंसा पत्र से भी सम्मानित किया गया। सेवाकाल में उन्होंने कई पदक व मेडल हासिल किया। दशरथ लाल ने बताया कि जब उन्हें ऑपरेशन विजय में शामिल होने का मौका मिला तो एक पल उनका मन परिवार को लेकर डगमगा गया। उस जमाने में फोन की सुविधा नहीं थी। उन्होंने घर टेलीग्राम किया। जवाब में पिता ने लिखा कि तुम देश के दुश्मनों का डटकर मुकाबला करों, घर मैं संभाल लूंगा। इसके बाद फिर दशरथ लाल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज दशरथ लाल के एक दामाद भी फौज में हैं। इसके अलावा उनका इकलौता बेटा बीएड कर रहा है। दशरथ लाल उसे भी फौज में भेजना चाहते थे।
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मौत का भी नहीं लगा था खौफ
कोखराज। दशरथ लाल का कहना है कि जिस वक्त वह दुश्मनों की गोलियों का सामना कर रहे थे, तब उन्हें मौत का तनिक भी खौफ नहीं लगा। साथियों को अगर गोली भी लगी तो सेना के बाकी लोग आगे बढ़ते जा रहे थे। पीछे चल रहे जवान घायलों को उठा कर इलाज के लिए ले जाते थे। सभी को न भूख का एहसास था और न प्यास का, बस मकसद एक ज्यादा से ज्यादा दुश्मन ढेर करना।
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दर्द होने पर याद आ जाती थी घटना
कोखराज। हवलदार दशरथ लाल का कहना है कि लड़ाई के दौरान उनकी पीठ पर एक भारी सा पत्थर आकर गिर गया था। साथ रही रेजीमेंट के सुबेदार मदन सिंह ने साथियों की मदद से पत्थर हटाया। चोट लगने से दर्द बहुत हो रहा था लेकिन उनका हौसला जवाब नहीं दिया। जंग जीतने के बाद ही वह वापस लौटे। दशरथ लाल का कहना है कि आज भी दर्द होने पर उनके जेहन में युद्ध की याद ताजा हो जाती है।
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