मंझनपुर। दोआबा के पुलिस अफसर बर्खास्तगी तो दूर निलंबन जैसी कार्रवाई का नाम भी लगता है भूल गए हैं। यह वजह है कि मनमानी करने वाले कर्मचारियों को सिर्फ पुलिस लाइन भेज दिया जाता है। बाद में जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कड़ी कार्रवाई नहीं होने का ही नतीजा है कि आए दिन कोई न कोई पुलिस कर्मचारी विभाग की किरकिरी करा देता है।
सूबे के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गृह जनपद कौशाम्बी में पुलिस लापरवाह हो गई है। आरोपियों से रिश्वत लेने, अमानवीयता बरतने, राह चलते किसी की पिटाई कर देने और पीड़ितों को ही प्रताड़ित किए जाने जैसे तमाम मामले आए दिन उजागर होते हैं। इन मामलों में पर्याप्त प्रमाण मौजूद होने के बावजूद आरोपी पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती। आम जनता को दिखाने के लिए आरोपी पुलिसकर्मी को लाइन हाजिर कर दिया जाता है। अधिकारी लाइन हाजिर किए जाने को ही कार्रवाई बताते हैं। जबकि कानून के जानकारों का मानना है कि पुलिस कर्मचारी को पुलिस लाइन करना कोई सजा नहीं है। यह सिर्फ स्थानांतरण है, जो नौकरी का अभिन्न हिस्सा है।
नगर कोतवाली क्षेत्र में तैनात सिपाही रवि सिंह का हफ्ते भर पहले ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें साफ तौर पर मारपीट के एक मामले में सिपाही आरोपी से 20 हजार रुपये लेने की बात स्वीकार कर रहा था। मामला संज्ञान में आने के बाद एसपी ने आरोपी सिपाही को लाइन हाजिर कर दिया। जबकि ऑडियो भ्रष्टाचार का केस दर्ज कराने के लिए पर्याप्त प्रमाण था। बाद में कार्रवाई किस स्तर की होती, यह विवेचना का विषय था। सरायअकिल कोतवाली क्षेत्र के चंदूपुर अमरायन गांव में गुरुवार सुबह दो पक्षों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इस दौरान गोली लगने से प्रधान के भाई सहित दो लोगों की मौत हो गई थी। तिल्हापुर चौकी में तैनात सिपाही राजकुमार मिश्र जीप में एक शव पर पैर रखे हुए था। वह इसी हालत में घटनास्थल से चीरघर तक गया। अमानवीयता का ऑडियो वायरल हुआ तो एसपी ने इस सिपाही को भी सिर्फ लाइन हाजिर कर दिया। जबकि ऐसे मामलों में दोषी सिपाही के खिलाफ शव के अपमान में केस दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
करारी कोतवाली क्षेत्र के बरई बंधवा गांव में एक महीने पहले दो पक्षों के बीच मारपीट हुई थी। मामले में हत्या का प्रयास सहित विभिन्न धाराओं में केस दर्ज हुआ। प्रधान समेत लगभग 12 आरोपी जेल भेजे गए। प्रकरण की जानकारी अरका चौकी प्रभारी को पहले से थी। उन्होंने कार्रवाई की होती तो शायद झगड़ा ही नहीं होता। मामले में दोषी पाए जाने पर चौकी प्रभारी को भी लाइन हाजिर ही किया गया। क्राइम के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिणांक द्विवेदी ने बताया कि किसी के शव पर पैर अथवा जूता रखने के मामले में 295 (क) के तहत दोषी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होनी चाहिए। इस धारा में तीन वर्ष की सजा है। यह धार्मिक भावना भड़काने के दायरे में आता है। वहीं एसपी का कहना है कि आरोप लगने पर दोषी के खिलाफ विभागीय जांच कराई जाती है। उसे अर्थदंड, परिनिंदा प्रविष्टि देने की कार्रवाई भी की जाती है। पर्याप्त सुबूतों के आधार पर रिपोर्ट दर्ज होती है। वायरल ऑडियो-वीडियो के मामलों में आरोपी दोषी अधीनस्थों की विभागीय जांच हो रही है। इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी।