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सवा सौ साल से ज्ञान बांट रहे मुस्तफाबाद के शिक्षक

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सवा सौ साल से ज्ञान बांट रहे मुस्तफाबाद के शिक्षक
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(शिक्षक दिवस पर विशेष)
-एक परिवार ऐसा जहां पीढ़ियों से हैं शिक्षक
-देश ही नही विदेशों में गांव के शिक्षकों ने अपने नाम का बजाया डंका
अमर उजाला ब्यूरो
करारी ।
150 सौ साल पहले गुलाम भारत में भी चायल तहसील का मुस्तफाबाद गांव शिक्षित था। यहां के लोगों का कभी शिक्षा से कोई समझौता नहीं किया। इस गांव में लगभग सवा सौ लोग शिक्षण कार्य से जुड़े हैं। देश के लगभग सभी हिस्से में यह लोग शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। विदेशों में भी इन्होंने अपने नाम का डंका बजाया है। मंगलवार को शिक्षक दिवस है। शिक्षक दिवस का नाम याद आते ही यहां के लोगाें को रिटायर्ड शिक्षकों का नाम बरबस याद आ जाता है। देश में शिक्षा की अलख जगा रहे इस गांव के लोगों के लिए सरकार की ओर से कोई पहल नहीं होती, यह कसक जरूर लोगों में है।
मुस्तफाबाद गांव में शिक्षा की ज्योति जलाने का बीड़ा सवा सौ साल पहले सैयद जव्वाद अहमद ने उठाया था। वह वर्ष 1900 से 1921 तक करारी मिडिल स्कूल में हेडमास्टर रहे। इसके बाद उनके तीन बेटे सरवर हुसैन, मंजूर हुसैन, नजर हसन भी शिक्षक हुए। इन्होंने भी अपने पुत्रों को शिक्षक बनाया। मंजूर हसन के दो बेटे नाजिर हसन व मसरूर हसन भी शिक्षक हैं। मंजूर हसन इस समय 92 वर्ष के हैं। पढ़ाई के लिए यह नाइजीरिया (अफ्रीका) चले गए थे। कनाडा हैलीपॉक्स विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रहे। अब वह कनाडा के मूल निवासी हैं। इसी परिवार के डॉ. फाजिल हाशमी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गेस्ट टीचर रहे। अब वह इलाहाबाद के एक डिग्री कालेज में उर्दू प्रवक्ता हैं। इनके अलावा मो. अब्बास आईआईटी मुंबई में शिक्षक हैं। इनके बड़े भाई अजादार हुसैन रिजवी भी शिक्षक थे, अब वह रिटायर्ड हो चुके हैं। इस गांव में शिक्षकों की पूरी जमात है। प्राइमरी से लेकर डिग्री कालेज तक में यहां के लोग ज्ञान बांट रहे हैं। इनके अलावा निजी कालेजों में भी यहां के शिक्षकों की भरमार हैं। वह भी देश के कई हिस्सों में। रिटायर्ड शिक्षक रामलखन, राममनोहर, शाकिर हुसैन, सुल्ताना अली आदि का कहना है कि जब शिक्षक दिवस आता है तो उनको अपने दिनों की याद ताजा हो जाती है। उनको यही दर्द है कि शिक्षक दिवस के मौके पर उनको याद नहीं किया जाता है।
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अजादार हुसैन की किताबों में पढ़ता है यूपी
मुस्तफाबाद के अजादार हुसैन रिजवी शिक्षा जगत की जानी मानी हस्ती हैं। यादगारे हुसैनिया इंटर कालेज में वह शिक्षक थे, अब रिटायर्ड हो चुके हैं। अजादार हुसैन रिजवी बताते हैं कि उन्हाेंने 13 साल तक एक भी दिन अवकाश नहीं लिया था। इसके लिए उनको अवार्ड भी मिला था। इसके अलावा वह उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद लेखक मंडल के अभी भी सदस्य हैं। लेखक मंडल में शामिल रहते हुए उन्होंने महान व्यक्तित्व कक्षा छह, सात और आठ की किताबें प्रकाशित करवाई, इसके अलावा गणित और विज्ञान की किताब उर्दू माध्यम की प्रकाशित करवाई। यह किताबें यूपी मदरसा बोर्ड में पढ़ाई जाती हैं। उनका भी यही कहना है कि शिक्षक दिवस पर उनके गांव के शिक्षकों की अनदेखी होती है।
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इनको भी जानें
मुस्तफाबाद गांव ने तीन वैज्ञानिक भी दिए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित वैज्ञानिक डॉ. गयूरुल हसनैन व डॉ. रेहाना आब्दी रहीं। डॉ. गयूरुल हसनैन भाभा रिसर्च सेंटर मुबई में वरिष्ठ वैज्ञानिक थे। पिछली भाजपा सरकार में जब पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण हुआ था, उसकी तैयारियों में इनका भी योगदान था। वहीं डॉ. रेहाना आब्दी मत्स्य विज्ञान संस्थान लखनऊ में कार्यरत हैं। वह वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। मछली से बीमारी फैलने पर वह देश के कई प्रदेशों का दौरा कर उसकी रोकथाम का इंतजाम करती हैं। यहीं के डॉ. मोहम्मद अब्बास सेंट्रल ड्रग्स एवं इंस्टिटयूट में हैं। वह विभिन्न रोगों की दवाओं पर रिसर्च करते हैं।
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