मंझनपुर (कौशांबी)।
बालू घाट शुरू हो गए हैं लेकिन दाम चौंकाने वाले हैं। एक ट्रक बालू 25 से 30 हजार रुपये की पड़ रही है। बालू का दाम बढ़ने से सरकारी कार्यों के निर्माण पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। प्रधानमंत्री आवास और शौचालय निर्माण कराने में भी लोगों के पसीने छूटने लगे हैं। बजट गड़बड़ हो चुका है। आवास व शौचालय की आधी रकम सिर्फ बालू में ही खर्च हो रही है। ऐसे में ईंट, सीमेंट, गिट्टी व मजदूरी गरीब लाभार्थी कहां से देंगे।
चालू वित्तीय वर्ष में जिले के 9819 गरीबों का चयन प्रधानमंत्री आवास के लिए किया गया है। पात्रता सूची में शामिल गरीबों के नाम की सूची शासन को भेज दी गई है। इनमें से 60 फीसदी लाभार्थियों के खाते में आवास की रकम भी मई माह में पहुंच चुकी है। रुपया खाते में आने के बाद भी लाभार्थी बालू के अभाव में आवास का निर्माण नहीं कर पा रहे थे।
इसी तरह स्वच्छता मिशन अंतर्गत एक लाख 24 हजार शौचालयों के निर्माण पर बालू का संकट था। ई-टेंडरिंग के बाद शनिवार शाम आठाें पट्टेधारकों को बालू खनन के लिए खनन विभाग से रवन्ना जारी हो गया। रवन्ना मिलते ही रात में कारोबारी खनन के लिए घाटों पर उतर पड़े। रविवार सुबह जब घाटों से बालू निकलकर गांवों व कस्बे में आई तो आवास व शौचालय के लाभार्थियों के होश उड़ गए।
सौ फिट (ट्रैक्टर की एक ट्राली) बालू घाटों पर पांच हजार की मिल रही है। जरूरतमंद को यह बालू ट्रैक्टर चालक सात हजार रुपए में दे रहा है। वहीं एक ट्रक बालू 25 से 30 हजार रुपये की पड़ रही है। ऐसे में आवास व शौचालय की आधी रकम बालू में ही खर्च हो रही है। बालू का भाव सुनकर प्रधानमंत्री आवास व शौचालय के लाभार्थियों ने निर्माण से हाथ खड़े कर लिए हैं।
मामला ई-टेंडरिंग का होने की वजह से जिले के जिम्मेदार भी बालू पट्टेधारकों पर शिकंजा नहीं कस पा रहे हैं। बहरहाल यही हाल रहा तो गरीबों के आशियाना निर्माण व स्वच्छता अभियान के शौचालयों का निर्माण अधर में पड़े रह जाना तय है।
महंगी बालू से महंगे हुए मकान
निजी के साथ सरकारी भी निर्माण कार्य होंगे प्रभावित
प्रधानमंत्री आवास और शौचालय निर्माण पर संकट
सरकारी कार्य कराने वाले ठेकेदार भी परेशान
जिले में प्रधानमंत्री आवास, शौचालय के अलावा शासकीय भवनों का निर्माण भी चल रहा है। इसमें मॉडल स्कूल, राजकीय स्कूल, न्यायालय का अर्द्धनिर्मित आवासीय भवन, विद्युत सब स्टेशन आदि शामिल हैं। इनके निर्माण का ठेका लेने वाली कार्यदायी संस्थाएं अभी तक बालू का इंतजार कर रही थीं। घाटों पर खनन शुरू होने के बाद जब बालू का भाव पता चला तो कार्यदायी संस्थाएं भी सकते में आ गई हैं। उधर पट्टेधारक हैं कि करोड़ाें रुपए खर्च कर पट्टा लेने के बाद भाव गिराने को तैयार नहीं हैं।
गांव के नाली, सीसीरोड पर भी संकट
ग्राम सभाओं में नाली, सीसीरोड विकास कार्यों के प्रमुख अंग माने जाते हैं। अधिकतर गांवों में राज्य व चौदहवें वित्त की धनराशि इन्हीं कार्यों में खर्च की जाती है। फरवरी माह तक ग्रामसभाओं को तीन हजार रुपए की सौ फिट बालू मिल रही थी, लेकिन बालू के बढ़े भाव ने ग्राम प्रधानों की नींद उड़ा दी है। अब ग्राम प्रधान व सेक्रेटरी भी विकास कार्य कराने के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
इतनी महंगी बालू कैसे बेची जा रही है, इसकी पड़ताल कराई जाएगी। पट्टाधारक किसी भी कीमत पर रेट में मनमानी नहीं कर सकेंगे। जिले में बालू खनन का काम नया नहीं है। 19-20 का अंतर ही मान्य होगा।
मनीष कुमार वर्मा, डीएम