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किस करवट बैठेगा वाराणसी में कौएद का ऊंट?

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देश की सबसे हॉट हो चुकी वाराणसी संसदीय सीट पर मंगलवार से सियासी पारा और गरम होने जा रहा है। यहां से टिकट फाइनल होने के बाद भाजपा प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के खिलाफ साझा प्रत्याशी की मांग करने वाला कौमी एकता दल (कौएद) समर्थन के मुद्दे पर 29 अप्रैल को अपने पत्ते खोलेगा।
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सियासी गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि कौएद आखिर किसे समर्थन देगा? एक धड़े का कहना है कि पार्टी पुराने अंतर्विरोधों को दरकिनार करते हुए कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को समर्थन दे सकती है वहीं दूसरे धड़े का मानना है कि कौएद आम आदमी पार्टी को समर्थन देगी।

इससे अलग पार्टी सूत्रों का कहना है कि जो प्रत्याशी गैर मुस्लिम मतों को अधिकाधिक अपने खाते में ले जाता दिखेगा, उसी के पक्ष में समर्थन का एलान हो सकता है।
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क्या है कोएद का चुनावी गणित?

कौमी एकता दल ने मोदी के मुकाबले मुख्तार अंसारी को उतारने की घोषणा की थी। इसके बाद निर्णय बदलते हुए साझा प्रत्याशी की बात की और मुख्तार को मैदान से हटा लिया।

अब पार्टी की एंटी भाजपा और मुस्लिम मतों को एकजुट करने की इस कवायद पर सभी दलों की नजरें टिकी हैं कि कौएद का ऊंट आखिर किस करवट बैठेगा।

करीब तीन लाख मुस्लिम मतदाताओं वाली वाराणसी संसदीय सीट से यूं तो कभी भी लोकसभा में किसी मुस्लिम ने प्रतिनिधित्व नहीं किया लेकिन प्रतिनिधि चुनने में जरूर अपनी अहम भूमिका निभाई है चाहे कांग्रेस के पक्ष में या फिर भाजपा छोड़ गैर कांग्रेस दल के पक्ष में।

समुदायिक वोटों की गणित के बाद होगा फैसला

वहीं दूसरे धड़े का मानना है कि पिछले 23 सालों में मुस्लिम मतदाताओं के बंटवारे के चलते ही भाजपा ही इस लोकसभा सीट पर काबिज होने में कामयाब रही है। ऐसे में इस बार मतों का बंटवारा रोकना बेहद अहम होगा।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुस्लिम मतों को एकजुट करने की मुहिम में जुटा कौमी एकता दल केवल मुस्लिम मतों के सहारे ही अपना निर्णय लेगा, ऐसा नहीं है। मंगलवार को समर्थन के ऐलान में उसका पलड़ा उसी पार्टी की ओर झुकेगा जो एंटी भाजपा गैर मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में करने का माद्दा रखता हो।

सूत्रों की मानें तो पार्टी ने मार्च में मुख्तार को वाराणसी संसदीय सीट से हटाने के बाद सभी दलों पर नजर रखी है कि वह मोदी के खिलाफ चुनाव जीतने के लिए क्या दांव आजमा रहे हैं। दल के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पिछले लोकसभा चुनाव में मुख्तार बसपा से लड़े थे।
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'आप' और कांग्रेस की लगी निगाहें

कोएद मान रही है कि बसपा का अपना काडर वोट है लेकिन अन्य वर्गों में उसकी पैठ को लेकर संशय बना हुआ है। समाजवादी पार्टी पर निगाह इसलिए नहीं टिक पा रही है कि अभी तक सपा हाईकमान ने अपने प्रत्याशी का माहौल बनाने में दिलचस्पी नहीं ली है।

कांग्रेस जरूर स्थानीय बनाम बाहरी के मुद्दे पर अच्छा लड़ रही है लेकिन प्रत्याशी की घोषणा देर से होने का खामियाजा उसे उठाना पड़ सकता है। उस समय मोदी के खिलाफ कांग्रेस का प्रत्याशी नहीं होने से आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने की अच्छी कोशिश की।

कौमी एकता दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अतहर जमाल लारी ने इस बाबत कहा कि अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है। समर्थन दिए जाने पर विचार हो रहा है। हां, यह तय है कि जो मोदी को अच्छी टक्कर देता दिखाई देगा, उसे ही दल समर्थन देगा।
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