कासगंज। एक नाबालिग लड़की के लापता होने के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि पीड़ित अगर नाबालिग है, तो उसकी कथित ''सहमति'' या ''मर्जी'' के आधार पर अपहरण जैसे गंभीर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को रद्द करते हुए तीन आरोपियों को अदालत में तलब किया है और नए सिरे से जांच के आदेश दिए हैं।सोरोंजी क्षेत्र की एक किशोरी को बहला-फुसलाकर ले जाने के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खान जीशान मसूद की अदालत ने पुलिस की अंतिम जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया है।
अदालत ने विवेचना में बड़ी कमियां पाते हुए तीनों आरोपियों श्यामू, राजवीर और मीरा देवी को समन जारी किया है। लड़की के पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि आरोपी उनकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर ले गए हैं।
जांच के दौरान किशोरी ने बयान दिया कि वह बिना किसी जबरदस्ती के अपनी मर्जी से अपनी बहन के घर चली गई थी। इस बयान को आधार बनाकर पुलिस जांच अधिकारी ने केस बंद करने की रिपोर्ट कोर्ट में लगा दी थी।
अदालत ने स्कूल के कागजातों की जांच की, जिसमें घटना के वक्त लड़की नाबालिग पाई गई। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि लड़की घर से इतनी दूर कैसे पहुंची और उसे ले जाने में किसकी भूमिका थी।
न्यायालय ने पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच किसी अन्य अधिकारी से कराकर 30 दिन के भीतर पूरक रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें। मामले की अगली सुनवाई 25 जून 2026 को होगी।
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कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी
-नाबालिग की सहमति जांच समाप्त करने का आधार नहीं हो सकती।
-किशोरी के घर छोड़ने की परिस्थितियों की पड़ताल जरूरी थी
-विवेचना में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई।
-नए विवेचक से वापस जांच कराने के आदेश दिए गए।