संवाद न्यूज एजेंसी
कासगंज। जिले की माटी से हिंदी को नए आयाम मिले हैं। यहां से खुसरो की मुकरियों और तुलसीदास की रामचरितमानस के जरिये हिंदी घर-घर पहुंची। इनसे हिंदी को विश्व फलक पर मान मिला है। यह सिलसिला अब भी कायम है।
हजरत अमीर खुसरो का जन्म सन 1253 में पटियाली कस्बे में हुआ था। पहेलियों और मुकरियों (पहेलीनुमा कविताओं) में खड़ी बोली के अनूठे प्रयोग से हिंदी का पहला कवि माना जाता है। उन्होंने हिंदी और फारसी में एक साथ रचनाएं की थीं। हिंदी को हिंदवी का नाम दिया था। अमीर खुसरो की ऐतिहासिक रचनाओं की वजह से ही कासगंज को हिंदी खड़ी बोली के उद्गम के बतौर जाना जाता है।
यहां के सोरोंजी शूकरक्षेत्र में जन्मे संत तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की। इस महाग्रंथ ने हिंदी को घर-घर पहुंचाया। इस कालखंड में हिंदी भाषा खूब समृद्ध हुई। विनय पत्रिका, दोहावली और कवितावली हिंदी के विकास में मील का पत्थर साबित हुईं।
क्यों मनाया जाता है दिवस
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन के महत्व को देखते हुए 1953 से इसे हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।
क्या कहते हैं साहित्यकार
जिले के लिए यह गौरव का विषय है कि यहां अमीर खुसरो और संत तुलसीदास जैसी महान विभूतियों का जन्म हुआ। अमीर खुसरो ने खड़ी बोली और गजल को हिंदी में जन्म दिया। उर्दू-फारसी के साथ देवनागरी लिपि को जोड़कर काव्य रचना की। इसके बाद हिंदी साहित्य में वीरगाथा काल और भक्तिकाल आया। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा और जायसी ने हिंदी को नई दिशा दी। इन सभी के प्रयासों से आगे बढ़ती हिंदी आज अपनी वैश्विक यात्रा तय करते हुए आधुनिक काल तक पहुंची है।
-डॉ. अखिलेश गौड़, साहित्यकार एवं चिकित्सक
तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसा अलौकिक ग्रंथ रचकर हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने में अतुलनीय योगदान दिया है। आज हर घर में रामचरितमानस का पाठ गूंजता है और लोग इसकी चौपाइयां गाते हैं। यह ग्रंथ हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार का सबसे सशक्त माध्यम है। इसे हिंदी के विकास का मूल आधार कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। वहीं अमीर खुसरो ने उस दौर में हिंदी खड़ी बोली को समृद्ध किया जब चारों तरफ फारसी भाषा का वर्चस्व हुआ करता था।
-डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, साहित्यकार
अखिलेश गौड़। संवाद