कासगंज। महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों ने बढ़-चढ़ कर आंदोलन में हिस्सेदारी ली। 1919 के जलिया वाला बाग के नरसंहार ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। इस नरसंहार के विरोध में ही असहयोग आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन ने कासगंज, एटा और समीपवर्ती क्षेत्रों के देश प्रेमियों को आंदोलन में हिस्सेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। 1907 में मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन में उतरे मानपाल गुप्ता ने रेलवे की नौकरी छोड़ दी थी। बनारस षड्यंत्र केस में उनकी सहभागिता होने से उन्हें जेल जाना पड़ा। उन्होंने रायबहादुरी का खिताब तथा अन्य उपाधियों को त्यागकर वकालत छोड़कर सक्रिय हिस्सा लिया। बाबूराम वर्मा ने अपनी वकालत छोड़ दी और और जेल गए। इसके अलावा रामस्वरूप मुक्त्यार, कुंदनलाल, बाबूराम साहू ने नियाज अहमद जुवेरी, आसिक अली, कृष्णकुमार और इब्राहीम जावेरी आदि अनेक कार्यकर्ताओं ने जमकर अंग्रेजों से लोहा लिया और जेल काटी। 1921 में ही स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय गतिविधियों का केंद्र कासगंज था। यहां असहयोग आंदोलन के साथ साथ खिलाफत आंदोलन भी तेजी से बढ़ा। एटा के विभिन्न कस्बे के लोगों ने कासगंज पहुंचकर हिस्सेदारी ली। इस आंदोलन की खास बात यह थी हिंदू और मुस्लिम दोनों समाज के लोगों ने एक साथ इस लड़ाई को लड़ा और जेल यात्राएं की। यहां के देश भक्तों ने आंदोलन में अद्भुत शौर्य का परिचय दिया, जिसके चलते क्रांतिकारियों का करवां लगातार बढ़ता रहा। 1922 में पटियाली में पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का बड़ा सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसमें क्रांतिकारियों ने क्रांति की रणनीति पर खून के हस्ताक्षर किए।