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Kanpur News: वन्यजीवों की मौत से कठघरे में चिड़ियाघर की व्यवस्था

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कानपुर। कानपुर चिड़ियाघर में वन्यजीवों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अगस्त से अक्टूबर के बीच करीब 24 वन्यजीवों की मौत ने उनके इलाज, संरक्षण और देखरेख की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी की जान निमोनिया और डायरिया से गई तो कोई हीमाप्रोटोजोन संक्रमण और आपसी संघर्ष का शिकार बना। सितंबर के अंत में ही छह हिरणों की संक्रमण से मौत हो गई। वन्यजीवों की देखरेख पर हर महीने लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हो पा रहा है। चिड़ियाघर प्रशासन वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल अक्तूबर के पहले सप्ताह में वन्य प्राणी सप्ताह मनाता है। विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों को वन्यजीवों की सुरक्षा का संदेश दिया जाता है, लेकिन चिड़ियाघर के भीतर लगातार हो रही मौतें इन प्रयासों के सामने चुनौती बन रही हैं।
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अगस्त में निमोनिया से पांच बतखों की मौत हुई, जबकि डायरिया से तीन चिंकारा हिरणों ने दम तोड़ दिया। सितंबर की शुरुआत में एक अजगर की मौत हुई, जिसकी बीमारी का पता ही नहीं चल सका। माह के अंत में हीमाप्रोटोजोन संक्रमण से छह हिरणों की माैत हुई। इसके अलावा एक जंगली भैंस के बच्चे और तीन चीतल हिरणों की मौत आपसी संघर्ष के कारण हुई। यही नहीं पांच गैंगेटिक घड़ियाल भी जान गंवा चुके हैं। छिड़काव तक सीमित बचाव के प्रयास
आरोप है कि संक्रमण से बचाव के लिए बाड़ों में चूने और एंटीवायरस दवा का छिड़काव कर औपचारिकता पूरी की जाती है। कई वन्यजीव छोटी जगहों और ऊंची घास के बीच रहते हैं। मौसम बदलने से पहले जोखिमग्रस्त वन्यजीवों की पहचान, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, बेहतर पोषण, बाड़ों की सफाई और संक्रमित पशुओं की निगरानी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। बीमार होने के बाद उपचार शुरू होने से कई बार जीवों की जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
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बीते वर्ष चेन्नई से लाए गए अजगर के जोड़े को सर्प गृह में रखा गया था। सितंबर में मादा अजगर ने करीब 15 दिन तक कुछ नहीं खाया। बाड़े में खरगोश डालने पर भी उसने भोजन नहीं किया। डॉक्टरों की टीम की निगरानी के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। अब बाड़े में केवल नर अजगर बचा है। आरोप है कि प्रशासन ने मादा अजगर की मौत की जानकारी सार्वजनिक नहीं होने दी।
वर्जन चिड़ियाघर के रेंजर फिरोज खान ने बताया कि बाड़ों की नियमित सफाई कराई जाती है। मौसम बदलने पर बीमार होने वाले वन्यजीवों का उपचार किया जाता है और कई की स्थिति में सुधार भी होता है। छोटे बाड़ों को दुरुस्त कराने का काम भी जारी है।
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