शहर के चमनगंज इलाके में गुपचुप तरीके से हुए महिला शहरकाजी पद के मनोनयन को गैरशरई बताते हुए बरेलवी विचारधारा के मौलाना शमीम नूरी ने सख्त बयान जारी किया है।
आल इंडिया जमात-ए-रजाये मुस्तफा के शहर अध्यक्ष मौलाना शमीम नूरी ने कहा कि कोई महिला या आलिमा महिलाओं को दीनी मसाइल बताने के लिए किसी खास जगह पर मजलिस (बैठक) कर सकती है लेकिन शहरकाजी नहीं बन सकती है। यह औरतों की शान के खिलाफ है। इस जमाने में महिला शहरकाजी जैसा कोई पद नहीं होता है।
मौलाना नूरी ने कहा कि इस जमाने में काजी-ए-शहर का पद हाकिम के जैसा होता है और औरतों की शयान-ए-शान नहीं कि वह काजी बनें। काजी-ए-शहर तमाम मुल्की, मिल्ली, सामाजिक मसलों पर शरीअत की रोशनी में फैसला करता है।
उन्होंने बताया कि इस मसले पर उन्होंने बरेली शरीफ में आल इंडिया सुन्नी जमात रजा-ए-मुस्तफा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती असजद रजा से बात की है। उन्होंने सुन्नी महिला काजी-ए-शहर को गैरशरई बताया है।
उधर, महिला शहरकाजी बनने के बाद मारिया फजल ने भी लिखित बयान जारी किया है। उन्होंने बताया कि उन्हें महिला शहरकाजी बनाने पर वह समाज में औरतों के अधिकारों की रक्षा के साथ इस्लामी शिक्षा के प्रसार का काम करेंगी।
वह चैनलों में बैठकर उनकी टीआरपी बढ़ाने का काम नहीं करेंगी। कहा कि वह उलेमा को यकीन दिलाती हैं कि उनके किसी अमल से किसी को कोई शिकायत या शर्मिदंगी नहीं होगी
इमाम की नियुक्ति पर विवाद
कानपुर। मुस्लिम यतीमखाना की प्रबंध कमेटी के फैसले के बाद विवाद खड़ा हो गया है। आठ साल पहले मस्जिद से हटाए जा चुके इमाम की दोबारा नियुक्ति पर कमेटी के कुछ सदस्यों में नाराजगी है। कार्यकारिणी सदस्य मास्टर मोहम्मद शाहिद बरकाती ने तो इस्तीफा भी दे दिया है। इससे यतीमखाने का माहौल गरमा गया है।
बता दें कि वर्ष 2007 में मस्जिद यतीमखाना के इमाम कारी कमाल फुरकानी पर कुछ गंभीर आरोप लगे थे। बाद में जांच कमेटी की रिपोर्ट पर 15 अप्रैल 2007 को उन्हें हटा दिया गया था। अब उन्हें दोबारा नमाज पढ़ाने की इजाजत दी गई है। इस फैसले से कुछ पदाधिकारी और सदस्य सहमत हैं, जबकि कई नाराज हैं।
इन आरोपों पर बढ़े मतभेद
वर्ष 2015-16 का बजट अगले वित्तीय वर्ष 3 जनवरी 2016 को पास कराना।
किसी भी बड़े फैसलों में कार्यकारिणी के सदस्यों की सहमति और स्वीकृति न लेना।
स्टेटस के लिए यतीमखाना कमेटी का ओहदा पाकर कुछ सदस्यों का बैठकों में शामिल न होना।
सांसदों द्वारा दी गई निधि से कराए जाने वाले कामों में पारदर्शिता का ध्यान न रखना।