प्रताड़ना से परेशान उर्मिला ने 28 अक्टूबर 1987 को फांसी लगाकर जान दे दी थी। टेलीग्राम से मिली सूचना पर पहुंचे उर्मिला के पिता धनद कुमार त्रिपाठी ने हरबंशमोहाल थाने में खुदकुशी के लिए उकसाने के मामले में पति विष्णुकांत, सास जनकदुलारी, ननद रजनी, देवर श्रीकांत व सौतेली पत्नी आशा पांडेय के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। एडीजीसी अरविंद डिमरी ने बताया कि पांचों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट भेजी गई थी। वर्ष 1992 में सेशन ट्रायल शुरू हुआ। मुकदमे में आरोपियों को जमानत मिलने के साथ ही हाईकोर्ट से स्टे भी मिल गया था। 26 साल बाद वर्ष 2018 में दोबारा मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। अभियोजन की ओर से चार गवाह कोर्ट में पेश किए गए। सबूतों और गवाहों के आधार पर कोर्ट ने पति विष्णुकांत को दोषी मानकर सात साल और देवर श्रीकांत को दोषी मानकर पांच साल कैद की सजा सुनाई। ननद रजनी व सौतेली पत्नी आशा को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। सास जनकदुलारी की मौत हो चुकी है।
मृतका की चिटि्ठयां बनीं सजा का आधार
उर्मिला अपने घरवालों को चिट्ठी में ससुरालीजनों की प्रताड़ना की बात लिखती थी। वह किसी राहगीर को चिट्ठी देती थी जो डाकघर में पोस्ट कर देता था। मरने से पहले 12 अक्टूबर 1987 की आखिरी चिट्ठी में उसने लिखा था कि दो दिन तक भूखी रहती हूं, कुछ कहती हूं तो कहते हैं पुलिसवालों से मांगो। श्रीकांत कह गए थे भाई मार डालो, जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। श्रीकांत बैंक में हैं, इन्हें अपनी सर्विस व पैसे का घमंड है। मुझे मारने की कोशिश की जा रही है। कहते हैं तड़पा-तड़पाकर मारूंगा, ऐसे प्राण नहीं लूंगा। किसी भी दिन जान से मार सकते हैं। दूसरी औरत है, लड़का है, मेरी क्या परवाह।
संतान न होने के कारण की थी दूसरी शादी
बचाव पक्ष का तर्क था कि शादी के 20 साल में भी संतान न होने से उर्मिला डिप्रेशन में थी। संतान के लिए उसकी मर्जी से ही दूसरी शादी हुई थी। घटना के दिन श्रीकांत यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में मथुरा की कुरसंडा शाखा में ड्यूटी पर था। ब्रांच मैनेजर ने पत्र देकर इसकी तस्दीक भी की थी, जबकि ननद रजनी की शादी हो चुकी थी और वह पति के साथ ससुराल में थी। चिट्ठी में श्रीकांत का नाम होने पर कोर्ट ने उसे भी मौत के लिए दोषी माना।