सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने बैंकों में बढ़ते एनपीए के लिए सरकार, शीर्ष पर बैठे नेताओं और बैकों के बड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। कहा कि बैंकों में देश की आम व गरीब जनता का पैसा जमा होता है, पूंजीपतियों और सरकार का नहीं। फिर बैंकों पर सरकार और पूंजीपतियों का नियंत्रण क्यों?
यह बड़ा सवाल है कि आखिर देश की पूंजी का संचालन कैसे हो और कौन करे ? वे बेनाझाबर स्थित बीएनएसडी शिक्षा निकेतन में ऑल इंडिया पीएनबी वर्कर्स आर्गेनाइजेशन के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल थे।
डॉ. जोशी ने कहा कि समाजवादी और कम्युनिस्ट शासन में देश की पूंजी पर सरकार का नियंत्रण होता है। जनता कमाती है और सरकार राज करती है। लेकिन लोकतंत्र में भी सरकार के लोगों और अधिकारियों में मिलीभगत चलती है। तमाम राष्ट्रीय स्तर की कमेटियों का चेयरमैन होने के कारण सरकार और अधिकारियों की मिलीभगत के केस उनके सामने आते हैं।
यूपी में एनआरएचएम घोटाला इसका जीगता जागता उदाहरण है। मिलीभगत के कारण ही मंत्री और अधिकारी जेल गए। आधा दर्जन लोगों के मर्डर हुए। बैंकों का पैसा लेकर लोग विदेश भाग जाते हैं। ये सब सरकार, बैंक के अधिकारियों और पूंजीपतियों की मिलीभगत से होता है। तब सवाल उठता है कि देश की पूंजी का उचित प्रबंध कैसे हो?
अपनी पूंजी पर नियंत्रण एफडीए से ज्यादा जरूरी
डॉ. जोशी ने बोला कि देश का पैसा विदेश न जाता तो यहां तमाम कल्याणकारी योजनाओं में लगता। हम देश में पूंजी जुटाने के लिए एफडीए ला रहे हैं, लेकिन अपनी पूंजी को नियंत्रित नहीं कर पा रहे। देश की पूंजी का निर्माण यदि देश में ही तो तभी असली विकास है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम लेकर कहा कि वे शिक्षा में एफडीए लाना चाहते हैं। क्या ये उचित है कि जमीन, संसाधन हमारे और पूंजी विदेशी लगाएं।
यूनियनें क्यों नहीं चला सकती बैंकें
डॉ. जोशी ने कहा कि बैंकों में जनता के धन की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार और बैंकों की है। लेकिन वे जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे। सवाल किया कि क्या बैंकों की यूनियन बैंक नहीं चला सकती? स्टूडेंट यूनियन बैंक क्यों नहीं चला सकते? उनका मानना है कि पूंजी के संचालन का नियंत्रण सरकार और पूंजीपतियों से हटाकर किसी संस्था को देना होगा। ऐसा नहीं किया गया तो जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा।