कानपुर। जिस एक यूनिट ब्लड से तीन लोगों की जान बचाई जा सकती है उससे सिर्फ एक की जान बच रही है। दरअसल डॉक्टर मरीजों को खून की पूरी यूनिट चढ़ा रहे हैं जबकि उन्हें ब्लड कंपोनेंट की जरूरत होती है। इस प्रकार खून की पूरी यूनिट चढ़ाने से वे कंपोनेंट बेकार चले जाते हैं जिनकी मरीज को जरूरत नहीं होती। अगर डॉक्टर मरीजों को वही कंपोनेंट चढ़ाएं जिनकी उन्हें जरूरत है तो बाकी कंपोनेंट दूसरे मरीजों के काम आ सकते हैं लेकिन ज्यादातर डॉक्टर होल ब्लड (एक यूनिट) की डिमांड करते हैं। होलब्लड बिना जरूरत चढ़ाया जाना शरीर के लिए भी नुकसानदायक होता है। डॉक्टर लिख रहे हैं इसलिए ब्लड बैंक वाले भी मना नहीं कर पा रहे हैं और पूरी यूनिट दे रहे हैं। पेश है इस मसले पर दुर्गेश त्रिपाठी की पड़ताल करती रिपोर्ट -
केस एक
नौबस्ता की नन्हीं देवी एनीमिया से पीड़ित हैं। इनका हैलट के मेडिसिन विभाग में इलाज चल रहा है। इन्हें ब्लड की जरूरत है। एनीमिया होने पर पैक्ड सेल चढ़ाया जाता है, लेकिन सीनियर डॉक्टर ने नन्ही देवी के परिजनों से होलब्लड की डिमांड की है। ब्लड बैंक के डॉक्टर जान - समझकर भी कुछ नहीं कर सकते। उन्हें पूरा ब्लड देना पड़ा।
केस दो
चमनगंज के नरसिंह का उर्सला में इलाज चल रहा था। कुछ समय पहले नरसिंह जल गए थे। उन्हें प्लाज्मा चढ़ाना चाहिए, लेकिन डॉक्टरों ने होलब्लड की डिमांड की थी। उर्सला ब्लड बैंक में प्लाज्मा होने के बाद भी डॉक्टरों को होलब्लड देना पड़ा।
कंपोनेंट लिखा जाना चाहिए
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. महेंद्र सिंह का कहना है कि डॉक्टरों को कंपोनेंट लिखना चाहिए। एक्सीडेंट और ऑपरेशन जिसमें ब्लीडिंग की संभावना ज्यादा हो को छोड़कर कंपोनेंट ही लिखा जाना चाहिए। मेडिकल कॉलेज में कंपोनेंट की कोई कमी नहीं होगी। एक यूनिट ब्लड से तीन जानें बचाई जा सकती हैं। डॉक्टरों को कंपोनेंट ही लिखना चाहिए। शरीर में जिस कंपोनेंट की जरूरत न हो उसे दिया जाए तो यह नुकसानदायक होता है।
हैलट से ही शुरुआत हो
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक की प्रभारी डॉ. सुमनलता वर्मा ने कहा कि कंपोनेंट देने के लिए हम पूरी तरह तैयार हैं। हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन डॉक्टरों को इसकी डिमांड भेजनी चाहिए। डिमांड आएगी तो कंपोनेंट तैयार होता रहेगा। ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाने की भी जरूरत है। अभी हैलट से ही होलब्लड की डिमांड आती है। सभी डॉक्टर इसके प्रति जागरूक हो जाएंगे तो ब्लड डोनेशन व्यर्थ नहीं जाएगा।
उर्सला पूरी तरह तैयार
जिला अस्पताल (उर्सला) के ब्लड बैंक के डॉ. एसके मिश्र ने कहा कि डॉक्टरों की डिमांड के अनुसार कंपोनेंट देते रहते हैं। कई मामलों में कंपोनेंट की जगह डॉक्टर होलब्लड की डिमांड करते हैं तो होलब्लड देना मजबूरी हो जाती है। फिर भी कोशिश रहती है कि डॉक्टर कंपोनेंट ही लिखें। एक यूनिट ब्लड से कम से कम तीन जानें तो बचाई ही जा सकती है। इसलिए सभी डॉक्टर जागरूक हों और कंपोनेंट लिखना शुरू कर दें तो काफी अच्छा रहेगा।
एक यूनिट ब्लड में यह कंपोनेंट बनता है
पैक्ड सेल, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा
किस बीमारी में कौन सा कंपोनेंट जरूरी
1- पैक्ड सेल - एनीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया, डायलिसिस। एक यूनिट से शरीर में एक ग्राम पैक्ड सेल बढ़ता है।
2- प्लेटलेट्स - डेंगू, कीमोथेरेपी, खून संबंधी कैंसर की बीमारियां। खून में प्लेटलेट्स की संख्या 10 हजार से कम हो और ब्लीडिंग हो रही हो तो ही प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
3- प्लाज्मा - बर्न, हीमोफीलिया, विटामिन के की कमी से होने वाली बीमारियां, लीवर, बाईपास सर्जरी।
नाको की है गाइडलाइन
नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) ने ब्लड कंपोनेंट लिखने के लिए गाइडलाइन भी जारी की है, लेकिन अब भी ज्यादातर डॉक्टर इसका पालन नहीं कर रहे हैं। नाको की गाइडलाइन में कंपोनेंट के इस्तेमाल और उनके फायदों का पूरा जिक्र किया गया है।
अमर उजाला की अपील
‘अमर उजाला’ ऐसे डॉक्टरों से अपील करता है कि वह मरीज की जरूरत के हिसाब से खून या कंपोनेंट की डिमांड करें। कंपोनेंट की जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, उर्सला अस्पताल और कुछ अन्य ब्लड बैंकों में पर्याप्त उपलब्धता है। स्वास्थ्य विभाग और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को भी इसके लिए आगे आना चाहिए और डॉक्टरों को कंपोनेंट लिखने को कहना चाहिए।