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UP: जहां लगने थे कारखाने…वहां उग आए हैं बबूल के जंगल, 18 साल बाद भी जमीन पर उतर नहीं बन पाई प्लास्टिक सिटी

Sun, 27 Oct 2024 03:58 PM IST
हिमांशु अवस्थी तारिक इकबाल, अमर उजाला, औरैया

सार

Auraiya News: वर्ष 2006 से 2024 के बीच 18 साल का लंबा समय गुजर चुका है। इस बीच कई बार अधिकारियों ने मुआयना किया। कारोबारियों ने सुविधा मुहैया कराने की गुहार लगाई, लेकिन सूरत नहीं बदली। अब की हकीकत यह है कि प्लास्टिक सिटी में दाखिल होते ही सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढों का दीदार होता है।
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प्लास्टिक सिटी में झाड़ियां - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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जिस जगह पर कारखाने लगने थे, वहां पर बबूल के जंगल उग आए हैं। घास इतनी उग आई है कि आसपास के गांव वाले पशु चरा रहे हैं। जिस सड़क पर वाहनों को फर्राटा भरना था वह बड़े-बड़े गड्ढों में गुम गई है। बीते 18 साल से दावा किया जा रहा है कि 350 एकड़ से ज्यादा की जमीन पर जल्द उद्योग-धंधे शुरू होंगे। हकीकत यह है कि विकास का पहिया उल्टा घूम रहा है।

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जिले के औद्योगिक क्षेत्र दिबियापुर में एनटीपीसी और गेल का प्लांट लगा है। इसी को ध्यान में रखते हुए यहां अलग से औद्योगिक नगरी बसाने का ताना-बाना बुना गया। वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में औरैया-दिबियापुर रोड से कंचौसी जाने वाली सड़क के करीब जमीन की तलाश की गई। यूपीएसआईडीसी की मदद से 331.58 एकड़ जमीन चिह्नित कर औद्योगिक क्षेत्र का नाम दिया गया।

साल 2012 में जब सपा की सरकार आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे प्लास्टिक सिटी का नाम दिया। मकसद था कि गेल में तैयार होने वाले प्लास्टिक दाना से प्लास्टिक से जुड़े उत्पाद तैयार करना। औद्योगिक माहौल बनेगा, बड़े निवेशक आएंगे। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, जैसे दावे किए गए। औद्योगिक, आवासीय टाउनशिप, बाजार, बैंक, स्कूल, छात्रावास, पार्क आदि का प्रस्ताव भी बना। तब से अब तक दो दशक बीतने को है, जो खाका तैयार किया गया था, वह पूरी तरह से धरातल पर नहीं उतर सका है।

18 साल का ऐसा है सफर...बहुत कठिन है डगर
वर्ष 2006 से 2024 के बीच 18 साल का लंबा समय गुजर चुका है। इस बीच कई बार अधिकारियों ने मुआयना किया। कारोबारियों ने सुविधा मुहैया कराने की गुहार लगाई, लेकिन सूरत नहीं बदली। अब की हकीकत यह है कि प्लास्टिक सिटी में दाखिल होते ही सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढों का दीदार होता है। कारखानों के लिए जो प्लॉट बने हैं, उनमें बबूल के पेड़ उग आए हैं। आसपास के गांव के लोग मवेशी चराते हैं। गांव लखनपुर निवासी बुजुर्ग रामनिवास ने बताया कि यहां घास खूब हैं। इसीलिए मवेशियों को चराने लाते हैं। मवेशी चरा रहे मिश्रीलाल ने बताया कि रात में चोर-उचक्के मंडराते हैं।

एक नजर में प्लास्टिक सिटी
  • 2006 में दिबियापुर के पांच गांवों की 331.58 एकड़ भूमि का अधिग्रहण
  • 274.4 एकड़ जमीन पर इंडस्ट्रियल यूनिट का प्रस्ताव
  • 84.93 एकड़ में रेजिडेंशियल यूनिट व इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट का खाका
  • इंडस्ट्रियल यूनिट में खिलौना, कुर्सी, प्लास्टिक पाइप से जुड़े उद्योगों की स्थापना होनी थी
  • 337 प्लॉट में से 175 का ही आवंटन हो सका है
  • 18 साल बाद भी 162 प्लॉटों का आवंटन नहीं हो सका है

इन सुविधाओं का दिखाया गया सपना
  • कौशल विकास केंद्र, टूल रूम, ट्रीटमेंट प्लांट, वेयरहाउस जैसी सुविधाएं मिलनी हैं।
  • प्लास्टिक के कच्चे माल की आपूर्ति के लिए गेल के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।

रेलवे की बेहतर कनेक्टिविटी, फिर भी नहीं आ रहे उद्यमी
दिल्ली-हावड़ा रूट पर पड़ने वाले कंचौसी व फफूंद रेलवे स्टेशनों से गुजरे रेलवे के ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से प्लास्टिक सिटी को रेल कनेक्टिविटी की सुविधा मिलेगी। यहां स्थापित होने वाले उद्योग के उत्पाद को रेल मार्ग से बाहर भेजने में आसानी होगी।

तो बदल जाएगी क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर
प्लास्टिक सिटी के आसपास के ग्रामीणों का कहना है कि इसका संचालन शुरू हो जाए और कारखानों में काम होने लगे तो क्षेत्र का काफी भला होगा। क्षेत्र और जिले के युवाओं को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा। अभी क्षेत्र के युवाओं को नौकरी के लिए कानपुर और दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है।

प्लास्टिक सिटी के विकास के लिए लगातार प्रयास जारी है। जिन निवेशकों को प्लॉट आवंटित हुए हैं, उनसे संपर्क कर काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।  -दुर्गेश कुमार, उपायुक्त उद्योग औरैया
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प्लास्टिक सिटी में बिजली की सुविधा बेहतर हुई है। कुछ जगहों पर लाइन डाली जानी है। सड़कों की मरम्मत के लिए प्रस्ताव जा चुका है। समय रहते बदलाव दिखेगा।  -अनुराग अग्रहरि, उद्यमी मित्र
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