शोध कार्य के अनुबंध को लेकर भी चर्चा
इस समस्या का हल निकालने के लिए ही मेडिकल कॉलेज और आईआईटी मिलकर काम करेंगे। इस संबंध में एक बैठक हो गई है। इस में शोध कार्य के अनुबंध को लेकर भी चर्चा हुई। इस प्रोजेक्ट में मेडिकल कॉलेज का माइक्रोबायोलॉजी विभाग और आईआईटी का बॉयोलॉजिकल साइंसेस एंड इंजीनियरिंग विभाग शामिल है। उन्होंने बताया कि इस्केप के इलाज के लिए विश्व स्तर पर अभी सटीक दवा उपलब्ध नहीं है। जो एंटी बयोटिक उपलब्ध हैं, वे बेअसर साबित होती हैं।
दवा तैयार करने में होगी आसानी
इस कारण मृत्यु दर में बढ़ोतरी हो रही है। इसके साथ ही बैक्टीरिया की दवा प्रतिरोधी शक्ति बढ़ रही है। डॉ. काला ने बताया कि दवा रोधी जीन की पहचान करने के बाद बैक्टीरिया खत्म करने की दवा तैयार करने में आसानी होगी। इस संबंध में तीन जनवरी को हुई बैठक में आईआईटी की विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सरोज चूड़ामणि, प्रोफेसर अशोक कुमार, डॉ. मातेश्वरम सर्मानंद, डॉ.राकेश कुमार मांझी, डॉ. एकता तथा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. काला, डॉ. मनीष सिंह, डॉ. विकास मिश्रा मौजूद रहे थे।
समूह में हैं ये बैक्टीरिया
इस्केप बैक्टीरिया समूह में एंटरोकोकस फेसियम, स्टैफिलोकोकस ऑरियस, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी, स्यूडोमोनस एरुगिनोसा और एंटरोबैक्टर एसपीपी हैं।
फेफड़ों के कैंसर पर भी करेंगे काम
आईआईटी मेडिकल कॉलेज के रेस्पेरेटरी मेडिसिन और मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों के साथ मिलकर फेफड़ों के कैंसर पर भी काम करेगा। इथिकल कमेटी की अनुमति के बाद इसे इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के शोध प्रस्ताव के रूप में शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही दोनों संस्थान स्टेम सेल के विभिन्न आयामों पर शोध करेंगे।