1984 में हुए सिख दंगों ने केवल कानपुर शहर में 127 लोगों की जानें ले ली थीं। ये तो केवल एक शहर की बात है इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली सच्चाई तो बाकी शहरों में देखने को मिली थी। कानपुर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले वकील प्रसून कुमार ने बताया कि दंगे में शहर के 127 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले में 32 आरोपी हैं। यह संख्या और घट बढ़ सकती है। उन्होंने मांग की है कि इस मामले की जांच एसआईटी (स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम) या सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन) से कराई जाए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार से उन्हें न्याय की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अब 24 अप्रैल को है।
80 फीट रोड स्थित एक होटल में स्वागत समारोह के दौरान पत्रकारों से बातचीत में उन्होेंने बताया कि गुरुद्वारा भाई बन्नो साहिब जीटी रोड के प्रधान मोहकम सिंह ने सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत शहर के सभी थानों से पांच सवाल पूछे थे। थानों से मिली जानकारी के अनुसार 127 लोगों के मरने की बात सामने आई है। प्रेसवार्ता में मोहकम सिंह, अजीत सिंह भाटिया, सतनाम सिंह सलूजा आदि मौजूद रहे।
मनमोहन सिंह मौनी बने रहे, मोदी से उम्मीद
अखिल भारतीय दंगा पीड़ित कमेटी के अध्यक्ष कुलदीप सिंह भोगल ने कहा कि सिखों को अब 33 साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से न्याय की उम्मीद है। दस साल तक तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौनी बाबा बने रहे। कांग्रेस पहले नंबर पर दोषी है, जबकि दूसरे नंबर पर प्रदेश की पूर्व बसपा और सपा सरकारें। इन लोगों ने कभी न्याय के लिए सोचा ही नहीं। अभी कनाडा सरकार ने भी माना है कि 84 में दंगा नहीं बल्कि नरसंहार हुआ था।
इन सवालों पर लगाई थी आरटीआई
- प्रत्येक थाने में कितने लोग नामजद हुए
- प्रत्येक थाना क्षेत्र में कितनों सिखों की मौत हुई
- प्रत्येक थाने में कितनोें के खिलाफ कार्रवाई हुई
- प्रत्येक थाने में कितना नुकसान दर्ज हुआ है
- प्रत्येक थाने की ओर से क्या कार्रवाई की गई है