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बदल गया मकनपुर उर्स का स्वरूप

Thu, 25 Feb 2016 01:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
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हजरत बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार का 599वां सालाना उर्स शुक्रवार से मकनपुर स्थित उनकी खानकाह पर शुरू होगा, जो कि तीन दिनों तक चलेगा। इस उर्स में देश विदेश के तमाम अकीदतमंद अपनी हाजिरी लगाएंगे।
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मलंगों के आने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। हालांकि पिछली छह सदियों से होते आ रहे इस उर्स का स्वरूप आज काफी हद तक बदल चुका है। बाकी हैं तो इस खानकाह के मुरीदों (दीवानगान) की आस्थाएं।

यह होता था पहले
सैकड़ों साल पहले इस उर्स में पहले दक्षिण भारत से लेकर देश के कोने कोने से आने वाले मलंगों (मुरीद) की संख्या लाखों होती थी। दारा शिकोह ने अपनी किताब में लिखा है कि 70वीं सदी में उन्होंने इस उर्स में पांच लाख का मजमा देखा। पहले हजरत जिंदा शाह मदार के चिल्लों से छड़ी मुबारक आती थी।
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इसे मलंग पैदल लेकर लेकर आते थे, जो कि महीनों बाद उर्स में पहुंच पाते थे। बड़े बड़े बादशाह और शहजादे उर्स में हाजिरी देते थे। मुगल शासन की ओर से मुरीदों को माहे मरातिब (शाही निशान) दिया जाता था, जिसे लेकर वह खानकाह पहुंचते थे। दीवानगी की हद में मलंग आग पर चलते थे।

यह है उर्स का बदलता स्वरूप
अब उर्स में पहले जैसी शाही शान देखने को नहीं मिलती है। बादशाह और शहजादे तो दूर देश या प्रदेश के मंत्री उर्स के दौरान नहीं दिखते हैं। शाही निशान और छड़ी मुबारक भी अब नहीं आती हैं।

मलंगों की संख्या लाखों में नहीं बल्कि हजारों में भी नहीं है। एक सैकड़ा या उससे अधिक मलंग ही अब उर्स में दिखते हैं। आग पर चलने की परंपरा नहीं है। बस शगल-ए-दम्माल (मलंगों द्वारा दरगाह पर इश्क की एक अवस्था) की परंपरा शेष है।

इसमें मलंग ‘दम्म मदार बेड़ा पार’ बोल मलंग झूमते हैं। हालांकि मुरीद और अकीदतमंदों की संख्या काफी है। जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका के मुरीद इस खानकाह पर हाजिरी देने आते हैं।
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