फर्जी असलहा लाइसेंस जारी करने के मामले में नोटशीट पर दो अफसरों की कलम फंस रही है। अभी तक की जांच में पता चला है कि नोटशीट पर इन अफसरों के साइन होने के बाद ही फर्जी असलहा लाइसेंस जारी किए गए हैं।
इन दोनों अफसरों के सामने पुलिस और तहसील की रिपोर्ट लगी फाइल रखते हुए बताया गया कि जिलाधिकारी ने यह फाइलें पुट अप (लाइसेंस जारी करने के लिए फाइलें मंगाना) की हैं। यह भी आशंका है कि डीएम के साइन स्कैन कर और कुछ पर फर्जी साइन कर लाइसेंस जारी करने के आदेश बनाए गए।
असलहा लाइसेंस के आवेदन पर तहसील और पुलिस की रिपोर्ट लगने के बाद फाइल तैयार होती है। हर फाइल पर एक नोटशीट बनती है। इस नोटशीट में फाइल का पूरा ब्योरा लिखते हुए लाइसेंस जारी करने का प्रस्ताव तैयार कर संबंधित अफसर की संस्तुति होती है। इस नोटशीट पर सहायक बाबू और फिर असलहा बाबू अपने साइन करते हैं। इसके बाद संबंधित अफसर साइन करते हैं।
ये होती लाइसेंस देने की प्रक्रिया
असलहा लाइसेंस लेने के लिए सबसे पहले आवेदक फार्म भरकर असलहा विभाग में जमा करता है। फार्म के साथ निवास, उम्र के प्रमाणपत्र, स्वास्थ्य प्रमाणपत्र, आधार कार्ड और अन्य कागजात लगाने होते हैं। असलहा विभाग फार्म की एक प्रति तहसील और एक प्रति पुलिस रिपोर्ट के लिए संबंधित थाने को भेजता है।
तहसील से सत्यापन रिपोर्ट लगाई जाती है। पुलिस आवेदक के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने या न होने की रिपोर्ट लगाती है। एलआईयू आवेदक के चाल-चलन की रिपोर्ट लगाती है। सभी रिपोर्ट लगने के बाद आवेदन वापस असलहा विभाग जाता है। इसके बाद लाइसेंस देने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट और एडीएम प्रस्तावक के रूप में नोटशीट पर साइन कर संस्तुति के साथ जिलाधिकारी के पास फाइल भेजते हैं।
इसके बाद जिलाधिकारी लाइसेंस जारी करने या न करने का आदेश देते हैं। लाइसेंस जारी करने का आदेश मिलने के बाद किताब (लाइसेंस बुक) जारी होती है। यही प्रक्रिया वरासत के लाइसेंस जारी करने पर लागू होती है। लाइसेंस बुक पर सिटी मजिस्ट्रेट या एडीएम के साइन होते हैं।