उप चुनाव में भाजपा की जीत ने जातिगत समीकरण को बिगाड़ दिया। जिस तरह से मतगणना के शुरू से आखिर तक रुझान आए, उससे साफ नजर आया कि भाजपा को सभी जातियों को वोट हासिल हुआ।
इस जीत से बिकरू कांड में ब्राह्मण की हत्या को लेकर उठा प्रचार और हाथरस कांड में सरकार दलित विरोधी हैं, विपक्षियों की तरफ से लगाए गए ऐसे नारे बेमानी साबित हुए। यह भी साफ हो गया कि प्रदेश सरकार से जनता गुस्से में नहीं बल्कि उसकी नीतियों का समर्थन करती है।
दलित वोटों के बल पर अपनी जीत पक्की मानकर चल रही बसपा सिर्फ हारी ही नहीं, उसे पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार एक पायदान और नीचे (तीसरे स्थान पर) पर संतोष करना पड़ा। इसी तरह पिछड़ों का नेतृत्व करने वाले दो पूर्व सांसदों, राकेश सचान और राजाराम पाल अपने कांग्रेस प्रत्याशी डा. कृपाशंकर को जिताने में पिछड़ी जातियों का भरोसा नहीं जीत पाए।
इतना जरूर है कि इस बार सपा की जगह मुस्लिम वोट उनके पक्ष में अधिक हुआ है। यही हाल समाजवादी पार्टी प्रत्याशी और पूर्व विधायक इंद्रजीत कोरी का है। हमेशा पिछड़ी जातियों के बल पर राजनीति करते आए कोरी इस बार एक पायदान नीचे खिसक कर चौथे पर चले गए।