यूपी बोर्ड स्कूल के संचालकों का मानना है कि अच्छी बिल्डिंग, बेहतर संसाधनों के बावजूद उनके स्कूलों को वो पहचान नहीं मिल पाती, जो सीबीएसई के स्कूलों की है। इसका सबसे बड़ा कारण सिलेबस है। सीबीएसई मेें एनसीईआरटी की किताबें चलती हैं। कम्प्टीशन और प्रोफेशनल कोर्सों के पेपर भी एनसीईआरटी पर आधारित होते हैं। इससे छात्रों को आगे चलकर मदद मिलती है। यही वजह है कि अब अभिभावक भी सीबीएसई स्कूलों को ही प्राथमिकता देते हैं।
इस कारण सीबीएसई के स्कूलों में छात्रों की संख्या भी अधिक होती है। इसके अलावा सीबीएसई स्कूलों और उनके छात्रों का रिजल्ट प्रतिशत भी अच्छा होता है। इस कारण सीबीएसई के छात्र मेरिट में भी आगे निकल जाते हैं।
जय नारायण विद्या मंदिर स्कूल के प्रधानाचार्य संतराम ने बताया कि उनके स्कूल की ओर से पिछले साल ही आवेदन किया था। औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। जुलाई-अगस्त तक मान्यता मिल सकती है। उन्होंने कहा कि पिछले साल दिल्ली में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि विद्या भारती से जुड़े सभी स्कूल सीबीएसई से संबद्ध होंगे। इसका मुख्य कारण सीबीएसई का सिलेबस है। उन्होंने कहा कि इस साल मान्यता मिल भी जाती है तो भी स्कूल यूपी बोर्ड से ही संचालित होगा। अभिभावकों को जानकारी दे दी गई है। सरस्वती ज्ञान मंदिर इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य एसके पाठक कहते हैं कि अभिभावक भी अब सीबीएसई बोर्ड में दाखिला करवाना चाहते हैं। बोर्ड में बदलाव के बाद छात्र संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
ऐसे मिलती है मान्यता
स्कूलों को पोर्ट कराने के लिए सीबीएसई की वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है। इसके बाद बोर्ड से गठित टीम स्कूल का निरीक्षण करती है। इसमें स्कूल की बिल्डिंग, ग्राउंड, संसाधनों का निरीक्षण करने के बाद रिपोर्ट देती है। इसके आधार पर मान्यता मिलती है।
सीबीएसई बोर्ड में जाना स्कूलों का अपना निर्णय है। हालांकि यूपी बोर्ड ने अपनी शिक्षा प्रणाली को काफी हद तक सुधारा है। सुधार आगे भी जारी है।
- सतीश तिवारी, डीआईओएस