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इन 2 चिकित्सकों के काम देखकर 'शर्म से पानी-पानी' हो जाएंगे मोटी फीस लेकर इलाज करने वाले

Thu, 29 Mar 2018 01:21 PM IST
मनोज चौरसिया, अमर उजाला, कानपुर
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कानपुर में सेवाभाव के लिए मशहूर हैं ये दोनों डॉक्टर
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मोटी फीस लेकर गरीब मरीजों को लूटने वाले डॉक्टर और प्राइवेट हॉस्पिटल वाले कानपुर के दो डॉक्टरों के काम देखकर शर्म से पानी-पानी हो जाएंगे। कानपुर के ये दो चिकित्सक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों के लिए एक ऐसा उदाहरण बनकर सामने आए हैं जिनके विचारों को अगर थोड़ा-थोड़ा भी जीवन में उतारा जाए तो कितने गरीब बीमार लोगों का भला हो जाएगा। हम आज बात कर रहे हैं इस शहर के मशहूर नेत्र रोग विशेषज्ञ  डॉ. महमूद रहमानी और फिजीशियन डॉ. अजीत मोहन चौधरी की।

 

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डॉक्टरों के लिए नजीर हैं डॉ. अजीत मोहन चौधरी

डॉ. अजीत मोहन की तारीफ कर चुके हैं पीएम
मन में सेवा भाव कम और पैसा कमाने की ललक रखने वाले डॉक्टरों के लिए नजीर हैं डॉ. अजीत मोहन चौधरी। मरीजों की सेवा के लिए उन्होंने कानपुर के चेतना चौराहा हनुमान मंदिर के किनारे सड़क पर क्लीनिक खोल ली है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में डॉ. मोहन की सराहना की थी। टेबल डालकर एक छाते के नीचे बैठकर डॉ. चौधरी (फिजीशियन) रोजाना 20 से 25 मरीजों का मुफ्त में इलाज करते हैं। साथ ही उन्हें दवाइयां भी देते हैं। वह रोजाना सुबह 10 से 11:30 बजे तक बैठते हैं। उन्होंने शहीदों के परिवार की सहायता के लिए एक दानपात्र भी रखा है, अगर कोई मरीज पैसा देना चाहता है तो उससे रुपये दानपात्र में डालने को कहते हैं। डॉ. चौधरी ने वर्ष-1978 में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से पीजी किया था। कुछ दिन एचएएल की डिस्पेंसरी में काम करने के बाद नौकरी छोड़ दी। उसके बाद उन्होंने पत्नी डॉ. स्मृति चौधरी के साथ लाल बंगला चौकी रोड पर 100 बेड का सरला नर्सिंगहोम खोला। यहां भी नार्मल चार्ज में मरीजों का इलाज होता है।

डॉ. महमूद ने Free में रोशन कर दी 1005 दृष्टिहीनों की दुनिया 

डॉ. महमूद रहमानी
कानपुर शहर में नेत्रदान की अलख जगाने वाले वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. महमूद रहमानी 1005 दृष्टिहीनों की दुनिया रोशन कर चुके हैं। नेत्रदान प्राप्त करने के लिए 200 किलोमीटर तक दूर जाने और अपने नर्सिंगहोम में सभी आपरेशन नि:शुल्क करने वाले डॉ. रहमानी ने आजीवन नि:शुल्क कॉर्निया प्रत्यारोपण करने का संकल्प लिया है। डॉ. रहमानी के नर्सिंगहोम में छह हजार से ज्यादा दृष्टिहीन परिजनों के सहयोग से कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। डॉ. रहमानी, युग दधीचि नेत्रदान अभियान के प्रमुख मनोज सेंगर और मेडिकल कालेज में लगभग 10,000 हजार लोग नेत्रदान के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। इनमें नगर और आसपास के जिलों के लोग भी शामिल हैं।

कुछ करने की ललक थीःडॉ. अजीत मोहन

डॉ. अजीत मोहन चौधरी मरीजों का निशुल्क इलाज करते हुए
डॉ. अजीत मोहन चौधरी बताते हैं कि उनके अंदर हमेशा से ही गरीबों और शहीद के परिजनों के लिए कुछ करने की ललक थी। इसके चलते 20 दिन पहले ही उन्होंने एक छाते और टेबल से ही क्लीनिक की शुरुआत कर दी। पहले तो मंदिर में दर्शन करने वाले भक्तों का चेकअप शुरू किया। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मरीजों की संख्या बढ़ती गई। परीक्षण के बाद मरीजों को मुफ्त में दवाइयां भी दी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर कुछ दवाइयां बाहर से लिख दी जाती हैं। दवाइयों के एवज में जो मरीज पैसा देना चाहता हैं, उसके लिए शहीदों के परिवार की सहायता के लिए दानपात्र रखवाया है। वह इस पैसे को शहीद सैनिकों के परिवार तक पहुंचाएंगे। गरीबों का इलाज करके बहुत शांति मिलती है। डॉ. चौधरी का एक बेटा अभिषेक चौधरी आईआईटी टॉपर है, वह अमेरिकन मल्टीनेशनल कंपनी में चांसलर है। वहीं, बेटी लवीना सिंगापुर में डॉक्टर हैं। छोटा बेटा डॉ. प्रदीप मोहन चौधरी और उसकी पत्नी डॉ. ज्योति चौधरी केपीएम में हैं।

चमनगंज में आंखों के इलाज के लिए नर्सिगहोम खोला

डॉ. महमूद रहमानी
डॉ. रहमानी ने 1987 में चमनगंज में आंखों के इलाज के लिए नर्सिगहोम खोलकर मामूली फीस पर मरीजों का इलाज और मरीजों, तीमारदारों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करना शुरू किया। वे बताते हैं कि शुरुआत में लोगों ने उनकी बात पर तवज्जो नहीं दिया, पर उन्होंने प्रयास जारी रखा। 1989 में होटल वेलब्यू की मालकिन मिस मर्चेंट की मृत्यु के बाद उनके कॉर्निया (नेत्र) दान में मिले। इनमें से एक कॉर्निया कॉनिया पतारा, घाटमपुर निवासी दृष्टिहीन राम अवतार को लगाया। यह उनका पहला नि:शुल्क कॉर्निया प्रत्यारोपण था। कॉर्निया प्रत्यारोपण नेत्रदान के 24 घंटे के भीतर हो जाना चाहिए। उस समय कोई दूसरा दृष्टिहीन कॉर्निया लगवाने के लिए तुरंत तैयार नहीं हुआ तो तत्काल दूसरा कॉर्निया अलीगढ़ के गोपी आई हॉस्पिटल भेजा, जहां उसे प्रत्यारोपित किया गया। रामअवतार उसी नेत्र से ताउम्र देखते रहे। डेढ़ साल पहले उनका निधन हुआ। उसी समय उन्होंने ‘नेत्रदान महादान’ अभियान शुरू करते हुए लोगों को इसके प्रति जागरूक करना शुरू किया। जगह-जगह पंफ्लेट्स, पोस्टर लगवाए। नर्सिंगहोम, क्लीनिकों में लोगों को नेत्रदान के प्रति प्रेरित किया, पर चार साल तक एक भी नेत्रदान नहीं हुआ। 

कानपुर शहर में नेत्रदान की परंपरा शुरू की

डॉ. महमूद रहमानी
1994 में उन्हें दूसरी बार दान में दो कॉर्निया मिले जिन्हें दो दृष्टिहीनों को लगाया। इस तरह शहर में नेत्रदान की परंपरा शुरू हुई। 1995 से उन्हें न सिर्फ कानपुर, बल्कि दूर के जिलों से भी नेत्रदान और कॉर्निया दान मिलने लगा। नेत्रदान की ऐसी धुन सवार थी कि दिन हो रात, जैसे ही नेत्रदान की सूचना मिलती, वे अपनी मारुति 800 कार से टीम को लेकर वहीं पहुंच जाते, नगर, देहात ही नहीं, बल्कि फतेहपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी आदि जिलों में जाकर भी नेत्रदान कराया। तब तक ढाई हजार से ज्यादा दृष्टिहीनों के पंजीकरण हो गए थे। धीरे-धीरे नेत्रदान के लिए लोग आगे आने लगे। जगह कम पड़ने पर उन्होंने चमनगंज में ही मुख्य मार्ग पर शिफा आई रिसर्च सेंटर खोला। बाद में मेडिकल कालेज में भी कॉर्निया प्रत्यारोपण शुरू हुआ।
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हज यात्रा अधूरी छोड़कर कराया नेत्रदान   

डॉ. महमूद रहमानी
2006 मे डॉ. रहमानी हज यात्रा पर जा रहे थे। वे दिल्ली तक पहुंच गए थे, वहां से उन्हें मदीना (सऊदी अरब) की फ्लाइट पकड़नी थी। एयरपोर्ट पर उन्हें नेत्रदान की सूचना मिली तो वहीं से यात्रा अधूरी छोड़कर दूसरी फ्लाइट से लखनऊ आए और वहां से लौटकर कॉर्निया प्रत्यारोपित किया। फिर दूसरी फ्लाइट से हज यात्रा के लिए रवाना हुए थे। दिल्ली, बंगलुरू, हैदराबाद सहित कई शहरों में कांफ्रेंस अधूरी छोड़कर भी लौट चुके हैं।
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