वह खौफनाक रात, जब गूंजी थीं गोलियां
पूरा मामला डकोर थाना क्षेत्र का है, जहां 12 दिसंबर 2004 की रात करीब ढाई बजे पूरा इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा था। पीड़ित जागेश्वर दयाल के घर को निशाना बनाते हुए सात से आठ सशस्त्र बदमाशों ने धावा बोल दिया था। शातिर बदमाश मकान के पीछे के रास्ते से होते हुए छत पर चढ़े और घर के भीतर दाखिल हो गए। बदमाशों ने घर में रखा कीमती बक्सा समेट लिया और भागने की फिराक में थे।
बदमाशों की आहट और बक्सा ले जाने की भनक लगते ही पीड़ित परिवार और आसपास के ग्रामीण जाग गए। घर के सदस्य अरविंद कुमार उर्फ राजू ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अदम्य साहस दिखाया और भाग रहे एक बदमाश को पीछे से दबोचने का प्रयास किया।
खुद को घिरता देख और पकड़े जाने के डर से बौखलाए बदमाश ने अरविंद पर सीधे तमंचे से फायरिंग झोंक दी। गोली अरविंद के पैर में लगी और वह लहूलुहान होकर वहीं गिर पड़े। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देकर बदमाश घर से करीब 15 हजार रुपये नकद, सोने-चांदी के कीमती आभूषण, साड़ियां और जरूरी दस्तावेज लूटकर अंधेरे का फायदा उठाते हुए फरार हो गए थे।
22 साल चली कानूनी लड़ाई, एक आरोपी अब भी फरार
वारदात के बाद डकोर थाना पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए तफ्तीश शुरू की और मामले में तीन आरोपियों— कृपाल सिंह, देवेन्द्र सिंह और रमेश के खिलाफ अदालत में पुख्ता चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की थी।
अदालत का फैसला: दोनों सजाएं चलेंगी साथ-साथ
विशेष अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों, बयानों और पुलिस द्वारा पेश किए गए अकाट्य सबूतों के आधार पर देवेंद्र सिंह और रमेश को डकैती और जानलेवा हमले का मुख्य दोषी माना। कोर्ट ने दोनों दोषियों को अलग-अलग धाराओं के तहत कड़ी सजा सुनाई:अदालत ने दोनों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा दी। इसके साथ ही धारा 397 आईपीसी के तहत 7-7 वर्ष के कठोर कारावास और 5-5 हजार रुपये के अतिरिक्त अर्थदंड से दंडित किया।