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तीन तलाक पर मसलक बदल रहे मुस्लिम

Fri, 28 Oct 2016 08:55 PM IST
सुहेल खान,अमर उजाला,कानपुर
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डेमो
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तीन तलाक के मसले पर देश भर में छिड़ी बहस के साथ साथ मुस्लिम समाज के अलग अलग फिरकों में इसको लेकर विवाद है। शिया एक बार में तीन तलाक को नहीं मानते हैं। सुन्नियों में भी अहले हदीस विचारधारा के मुसलमान एक साथ दिए गए तलाक को गैरइस्लामी मानते हैं और उनके मुताबिक एक साथ तीन तलाक से मियां-बीवी का रिश्ता खत्म नहीं होता है। ऐसे में सुन्नियों के बरेलवी और देवबंदी विचारधारा के मुसलमान जो गलती से एक साथ तीन तलाक दे देते हैं, वे अहले हदीस मसलक के उलेमा से फतवा लेकर फिर से शादीशुदा जिंदगी गुजारने लगे हैं। तीन तलाक से प्रभावित बरेलवी या देवबंदी मुसलमानों को अहले हदीस विचारधारा से मिली राहत से अहले हदीस मुस्लिमों की संख्या बढ़ रही है।
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अहले हदीस के मुताबिक तलाक
अहले हदीस विचारधारा (सलफी विचारधारा) के संगठन जमीअत अहले हदीस के कानपुर के अध्यक्ष मोहम्मद इकबाल मोहम्मदी ने बताया कि एक बार में अगर किसी ने तीन तलाक दे दिया तो उसे तीन नहीं बल्कि एक माना जाएगा। तीन तलाक का मतलब तीन नशिस्त (अंतराल या बैठकें) से है। दूसरा और तीसरा तलाक देने में तीन महीने का अंतराल होना चाहिए। एक बार में तीन या कई बार तलाक बोल देने से उसे एक ही माना जाता है। दूसरे अंतराल (तीन महीने बाद) के बाद तीसरे तलाक पर ही मियां-बीवी का रिश्ता खत्म होगा।

पिछले दो सालों में करीब 250 ऐसे मामले उनके पास है, जिन्होंने एक बार में तीन तलाक दे दिया था। बरेलवी और देवबंदी विचारधारा के उलेमा ने उसे तलाक मान लिया । जबकि कुरान और हदीस के साथ बनारस के मदरसा जामे सलफिया के फतवे की रोशनी में उन्होंने पीड़ित पक्ष को लिखित फतवा दिया कि उनका तलाक नहीं हुआ है। आज वे सभी खुशहाल जिंदगी गुजार रहे हैं और अहले हदीस विचारधारा के मुताबिक जिंदगी गुजार रहे हैं। इस समय शहर में करीब 70 हजार लोग अहले हदीस मसलक के मानने वाले हैं।
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