कानपुर। भाई, गबन दे दे। कल ही पढ़ना शुरू की है...। अरे नहीं! अभी तो मैंने आधी पढ़ी है। चोरी का माल तो बांट लूंगा लेकिन किताब नहीं। तभी पास खड़ा युवक मुस्कुरा कर बोला- तुम लोग लड़ो, मैं तो हाफ गर्लफ्रेंड से ही खुश हूं। ये नजारा दिखा शुक्रवार को जिला कारागार की लाइब्रेरी का। करीब 75 साल पुरानी इस लाइब्रेरी में सामने बोर्ड पर लिखा है। जिला कारागार पुस्तकालय समय-सुबह आठ से शाम चार बजे तक।
रोशनदान से छनकर आ रही सूरज की रोशनी किताबों के ढेर पर पड़ रही है। यहां छाई खामोशी में पन्ने पलटने की आवाज भी साफ सुनी जा सकती है। शीशे की अलमारियों में रखीं करीब 4000 किताबें बेहद व्यवस्थित हैं। इस लाइब्रेरी में आध्यात्म, दर्शन, प्रेरक आत्मकथाएं सब कुछ मौजूद है। आध्यात्म के साधक गीता-रामायण, कुरान पढ़कर गुनाहों का प्रायश्चित कर रहे हैं तो कुछ बुद्ध और विवेकानंद के विचारों में जीवन का अर्थ तलाश रहे हैं।
सुरक्षा के लिहाज से पुलिस कर्मी भी मौजूद हैं। जेल प्रशासन का मानना है कि किताबें सिर्फ समय काटने का जरिया नहीं बल्कि सोच बदलने की चाबी भी हैं। कोई कैदी धार्मिक पुस्तकों को पढ़कर आत्ममंथन करता है तो कोई प्रेरक साहित्य से जीवन की नई राह खोजता है। कमरे से बाहर वही ऊंची दीवारें, वही सन्नाटा लेकिन अंदर है...किताबों की दुनिया जहां किताबों की कहानी हर किसी बंदी के दिल को छू रही है।
जेल और पुस्तकों का इतिहास है गवाह
जेल और किताबों का रिश्ता पुराना है। गांधी, नेहरू, मंडेला सबने सलाखों के पीछे पढ़ा और लिखा। कानपुर जेल के कैदी भी अब उसी राह पर चल पड़े हैं।
कोट:
जेल केवल सजा काटने का स्थान नहीं बल्कि सुधार और पुनर्वास का केंद्र भी है।
किताबें कैदियों के जीवन की दिशा बदल रही हैं। यही हमारी सबसे बड़ी जीत है।
-बीडी पांडेय, जेल अधीक्षक