जिन रोगियों को अस्थमा और सांस की एलर्जी नहीं है, उन्हें भी प्रदूषण के कारण गर्मी में अस्थमा के लक्षण उभर रहे हैं। वायरल और बैक्टीरिया के साथ दमा का भी लक्षण मिल रहा है। यह दिक्कत चार से 10 साल के बच्चों में अधिक पाई जा रही है।
वरिष्ठ बाल सांस रोग विशेषज्ञ डॉ. राज तिलक ने बताया कि गर्मी में हवा में आद्रता नहीं होती। प्रदूषण के तत्व मौजूद रहते हैं। इनके प्रभाव से सांस फूलने लगती है। इससे आम रोगों के लक्षण भी गंभीर हो जा रहे हैं।
कानपुर में भारतीय बालरोग अकादमी के सांस रोग अध्याय के संस्थापक अध्यक्ष और बालरोग अस्पताल के अस्थमा क्लीनिक प्रभारी डॉ. राज तिलक ने बताया कि प्रदूषण का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ रहा है।
नवजात जैसे दुनिया में आता है, उसके शरीर के अंदर प्रदूषण फैलाने वाले 287 तत्व पहले ही मौजूद रहते हैं। हाईवे किनारे पांच किमी के दायरे में रहने वालों को अस्थमा का चार गुना अधिक खतरा रहता है। धूल कण और डीजल की गैस सबसे अधिक घातक होता है।
अकादमी के सैंपल सर्वे के मुताबिक मेट्रोपोलिटन शहरों में दमा की दिक्कत अधिक बढ़ रही है। सिजेरियन बच्चे को 18 फीसदी, जिनके घर की दीवारों में नमी होती है उन्हें आठ फीसदी, ऊपर का दूध पीने वाले बच्चों को 10 फीसदी अधिक दमा का खतरा रहता है।
इसके अलावा वायरल फीवर होने पर दमा के लक्षण और उभर आते हैं। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने से प्रदूषण के तत्वों का शरीर के अंदर दुष्प्रभाव बढ़ने लगता है। इसका दुष्प्रभाव शरीर के हर अंग पर आता है।