कानपुर। भरण-पोषण की धारा का उद्देश्य किसी पुरुष को ऐसे नैतिक दायित्व का पालन करने के लिए मजबूर करना है जिसके लिए वह अपनी पत्नी व संतान के बावत सामाजिक कर्जदार है। इसी टिप्पणी के साथ पारिवारिक न्यायालय के द्वितीय अपर प्रधान न्यायाधीश राकेश त्रिपाठी ने पेंशनभोगी सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी को भी पत्नी व बेटे के लिए गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है।
न्यू आजादनगर निवासी युवती का विवाह कर्रही निवासी युवक से नवंबर 2007 में हुआ था। युवती के पिता पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल पद से सेवानिवृत्त हैं जबकि युवक सेना में कार्यरत था लेकिन शराब का लती होने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। युवती ने वर्ष 2019 में पति के खिलाफ भरण-पोषण के लिए वाद दायर किया था। इसमें आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही पति दहेज के लिए प्रताड़ित करता था और तरह-तरह से शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना भी देता था। जनवरी 2014 को मार पीटकर उसे व बेटे को घर से निकाल दिया था। वहीं, पति का तर्क था कि पत्नी को कई बार वापस लाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं लौटी। वह सेना से सेवानिवृत्त है और सिर्फ पेंशन से ही उसका गुजारा होता है। पत्नी खुद पढ़ी-लिखी और सक्षम महिला है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि कानून में भरण-पोषण की धारा इसलिए बनाई गई है कि पत्नी व संतान को दीनहीन स्थिति में न छोड़ा जाए जिससे वह अपने गुजारे के लिए आवारा एवं अनैतिक जीवन बिताने के लिए मजबूर हो जाए। कोर्ट ने पति की पेंशन के आधार पर पत्नी को पांच हजार व बेटे को चार हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने के निर्देश दे दिए हैं।