हड़ताल का सबसे ज्यादा असर उन पर रहा जिनके पास अपना कोई वाहन नहीं था। रिक्शे वालों का मनमाना किराया चार कदम के आठ रुपये न देने वाली महिलाओं ने बच्चे गोद में उठाए और वृद्धों ने पैदल रास्ता नापा तो उमस में उनकी सांस फूल गई। निजी वाहन चालकों को राहत रही।
कहीं पर भी जाम की समस्या नहीं दिखी। खाली सड़कों पर आराम से निकलते रहे। आपस में यही चर्चा करते रहे कि काश! रोज इसी तरह खाली सड़कें मिलें तो आफिस पहुंचने में कभी भी देर न हो।
मांगें उनकी, पर मेरा क्या कसूर !
कानपुर। श्रमिकों और कर्मचारी संगठनों के आह्वान पर बुधवार को हुई हड़ताल से आम जनता बेहाल हो उठी। जिनके घरों में निजी वाहन नहीं थे वे शहर में ही इधर से उधर जाने को तरस गए। जो लोग मजबूरीवश निकले भी उन्हें चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। यहां से अन्य शहरों को जाने वालों पर तो जैसे आफत टूट पड़ी।
बसों के इंतजार में सुबह से शाम तक भूखे प्यासे बस अड्डों, चौक चौराहों और पेड़ के नीचे बैठे मिले। ठेले खोमचे वालों ने खाने पीने के सामान के मनमाने दाम वसूले। दूसरे शहरों से किसी तरह यहां पहुंचे लोग अपने ‘ठिकाने’ तक पहुंचने के लिए रिक्शे वालों से मिन्नतें करते दिखे। सवारी न मिलने से बीमारों और बुजुर्गों के प्राण हलक में अटके रहे।
निजी वाहनों से सरकारी कार्यालयों में काम के लिए पहुंचे लोगों को निराशा हाथ लगी। कर्मचारी हड़ताल के समर्थन के बहाने दफ्तरों से नदारद रहे। जो मौजूद भी रहे उन्होंने काम नहीं किया। अस्पतालों में मरीजों की कम संख्या बता रही थी कि बीमारी कम नहीं हुई, बल्कि उन्हें अस्पताल तक पहुंचने का साधन नहीं मिला।
पैर में गठिया के दर्द से परेशान बुजुर्ग गोविंदपुरी पुल चढ़ते समय छांव तलाशते रहे। थक हारकर वहीं फुटपाथ पर बैठ गए और बाइक आती देख आगे तक छोड़ देने के लिए दूर से हाथ जोड़ लिए। उतरे तो सवाल दाग गए...बोले पत्रकार हो... हड़ताल करने वालों से पूछना मेरा क्या कसूर था।
बस अड्डों पर सन्नाटा और उदास यात्री
कानपुर। रोडवेज की यूनियनों के आह्वान पर शहर में बसों के चक्के जाम रहे। रात 12 बजे ही यूनियन वालों ने बसों को डिपो से बाहर कर दिया था। झकरकटी स्थित मेजर सलमान अंतर्राज्यीय रोडवेज स्टेशन पर सन्नाटा पसरा रहा। सिर्फ फतेहपुर, इलाहाबाद और गोरखपुर समेत कुछ अन्य जिलों के डिपो की बसें ही खड़ी रहीं।
यही हाल किदवईनगर, फजलगंज, विकास नगर डिपो का रहा। दोपहर में कुछ नेताओं ने नारेबाजी करते हुए एक बस के टायर पंचर कर गेट पर तिरछा करके लगा दिया, ताकि कोई चालक बस बाहर न निकाल सके। इलाहाबाद और फतेहपुर से आईं कई बसें तो रामादेवी पर ही सवारियां उतारकर लौट गईं।
दोपहर ढाई बजे यूनियन के नेताओं की लखनऊ में एमडी से वार्ता होने के बाद हड़ताल समाप्त हुई। क्षेत्रीय प्रबंधक नीरज सक्सेना ने बताया कि शाम को बसों का संचालन शुरू हो गया। सेंट्रल रीजनल वर्कशाप कर्मचारी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष त्रिलोकी व्यास, यूपी रोडवेज इंप्लाइज यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष रामजी त्रिपाठी ने कहा कि हड़ताल सफल रही।
‘हरे दबंग’ भी दुबके
कानपुर। शहर में धमाचौकड़ी मचाने वाले हरे दबंग नदारद रहे। किसी भी रोड पर आटो और टेंपो चलते नजर नहीं आए। डिप्टी पड़ाव चौराहे पर सुबह एक टेंपो आकर रुका तो सवारियां दौड़कर चढ़ने लगीं। इस पर अन्य टेंपो वालों ने उसे भगा दिया। यूनियन के विरोध के चलते किसी टेंपो चालक की हिम्मत सड़क पर निकलने की नहीं हुई।
घंटाघर, बड़ा चौराहा, रामादेवी, फूलबाग, लाल बंगला, जाजमऊ, बर्रा, किदवईनगर, विजय नगर, कल्याणपुर, रावतपुर आदि चौराहों पर सैकड़ों यात्री वाहन के इंतजार में खड़े रहे। सेंट्रल रेलवे स्टेशन से भी 256 आटो टेंपो और 80 टैक्सी नहीं चलीं।
महानगर टेंपो टैक्सी यूनियन के अध्यक्ष रामगोपाल पुरी ने बताया कि केंद्र का नया प्रस्तावित बिल बहुत खतरनाक है। इस रोड सेफ्टी बिल के पारित होने पर कोई वाहन नहीं चला सकता है।
केंद्रीय परिवहन मंत्री से सात सितंबर को नई दिल्ली में वार्ता होगी। टेंपो टैक्सी यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष अनंत राम बाजपेयी ने भी कहा कि हड़ताल पूरी तरह सफल रही।
किसी का नहीं कटेगा वेतन
हड़ताल में शामिल रहे श्रमिक-कर्मचारियों का वेतन या दैनिक मजदूरी नहीं काटा जाएगा। लेबर रिप्रजेंटेटिव्स एसोसिएशन के मंत्री असित कुमार सिंह ने बताया कि प्रदेश में‘नो वर्क नो पेमेंट’ अधिनियम लागू है।
ये प्रावधान तब लागू होते हैं, जब बिना सूचना के हड़ताल या प्रदर्शन किया जाए। दो सितंबर की हड़ताल को लेकर सभी ट्रेड यूनियनों ने 15 दिन पहले ही श्रम विभाग के अलावा अन्य विभागों को नोटिस भेजा था।