कोरोना संकट की वजह से दूसरे प्रांतों से जैसे तैसे लौटे लोगों ने अब अच्छीखासी नौकरी का मोह त्याग दिया है। वे घर या घर के नजदीक रहकर ही अपनी जिंदगी आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। कानपुर-सागर हाईवे किनारे स्थित बिठूर विधानसभा के बिधनू के मगरासा गांव के रहने वाले अजय की कहानी इनमें से एक है।
अजय नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) में काम करने वाली एक कंपनी में सुपरवाइजर थे। 40 हजार तक महीना कमा लेते थे। अब मनरेगा (202 रुपये प्रतिदिन) में मजदूरी कर जीवन बसर कर रहे हैं।
अजय राजस्थान के मेहंदीपुर में पिछले कई सालों से कंपनी के साथ काम कर रहे थे। वे हाइवे निर्माण कार्य में दक्ष हैं और सैकड़ों मजदूर उनके अधीन काम करते थे। लॉकडाउन में परेशानियां बढ़ीं तो जैसे तैसे गांव लौट आए।
15 दिन पहले ही उन्होंने गांव में मजदूरी करनी शुरू कर दी। कभी मनरेगा में तो कभी मनरेगा के अलावा। अजय बताते हैं कि सरकारी निर्माण कार्यों को शुरू करने की मंजूरी मिली है तो कंपनी ने उन्हें वापस बुलाना चाहा। उनके लिए ट्रेन का कन्फर्म टिकट भी भेजा।