सड़कों के किनारे मिलने वाले विभिन्न स्टाइल के सस्ते गॉगल्स आंखों के लिए नुकसानदायक हैं। इसकी वजह है इसका मटेरियल, जो सस्ते प्लास्टिक का बना होता है। यह सौ रुपये तक में मिल जाते हैं। इन्हें खरीदने वालों में ज्यादातर युवा हैं, जो सस्ते और फैशन के फेर में इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करते हैं।
नेत्र चिकित्सक बताते हैं कि इन गॉगल्स के साइड इफेक्ट ज्यादा हैं। गर्मियों में ये और ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। गर्मियों में आई इंफेक्शन की समस्या बढ़ गई है। नेत्र विशेषज्ञ डा. अतुल गंगवार का कहना है कि युवा आंखों की सुरक्षा को लेकर अवेयर नहीं हैं।
फैशन के संग सुरक्षा भी जरूरी
सर्दियों की तुलना में गर्मी में यूवी रेडिएशन तीन गुना ज्यादा होता हैं। गर्मियां शुरू होते ही धूप के चश्मे की जरूरत महसूस होती है। युवा फैशन और स्टाइल के चक्कर में नकली ब्रांड या सस्ते सन ग्लासेज इस्तेमाल करते हैं। जबकि आंखों की सुरक्षा के लिए अच्छे लैंस वाले सनग्लासेज जरूरी हैं। जो अल्ट्रावॉयलेट किरणों को रिफ्लेक्ट कर सकें।
युवा वर्ग धूप के चश्मे सुरक्षा के लिहाज से नहीं, बल्कि फैशन के अनुसार उपयोग करते हैं। धूप का चश्मा धूप, धूल, धूआं और छोटे कीड़ों से आखों की सुरक्षा करता है। लगातार लंबे समय तक घटिया लैंस का चश्मा पहना जाए तो इससे आंखों को नुकसान होता है।
धूप से टूट जाती है टियर सेल, आई मेंबरेन हो रही डेमेज
तेज धूप के कारण आंखों की रोशनी पर प्रतिकूल असर पड़ने के कारण धूल के कण रेटिना को नुकसना पहुंचाते हैं। सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों से आंखों के ऊपर बनी टियर सेल या आंसू की परत टूटने या क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, जिससे आंखों के कार्निया को भी यूवी किरणों से उतना ही नुकसान पहुंचता है।
आंखों की निचली और ऊपरी पलकों की बाहरी परत को कंजेक्टिवा कहते हैं। ये आंखों का एक बहुत ही संवेदनशील भाग है। जब इस मेंबरेन को धूप में दिक्कत होती है, तब इसमें खुजली होनी शुरू होती है। ये वायरल, बैक्टीरियल और एलर्जी संक्रमण, कजक्टिवाइटिस कहलाता है। धूप में इसे कवर करने के लिए सनग्लास पहनना जरूरी है।