कृष्णा अपने सेवाभाव के कारण ‘समाज सेविका’ बुलाई जाती हैं। उन्होंने अपनों से कई जख्म खाए। पर, कभी हिम्मत नहीं हारी। दूसरों की सेवा के लिए भले ही कितनी दूर जाना पड़े, वह कभी पीछे नहीं हटती हैं।
कृष्णा अपनी और मानसिक व शारीरिक रूप से अस्वस्थ (मेंटली रिटारडेड) बेटी प्रगति की परवरिश के लिए तमाम सरकारी-गैर सरकारी दफ्तर और बैंकों के बाहर लोगों के आवेदन पत्र भर कर मिलने वाले पैसे से अपना घर चलाती हैं। लेकिन किसी निर्धन और असहाय की मदद करनी हो तो कृष्णा अपना दुख भी भूल जाती हैं।
समाज सेवा का कोई भी मंच हो, कृष्णा अपनी बेटी प्रगति के साथ वहां पहुंच कर संस्था और लोगों की निशुल्क सेवा करती हैं। इन्हें शहर के हर छोटे बड़े मंच पर सेवा करते देखा जा सकता है।
कृष्णा गांधी ग्राम में अपनी बेटी के साथ रहती हैं। इनका जन्म आगरा में हुआ था। शादी कानपुर में होने से शहर आ गईं। शादी के कुछ साल बाद पति की मौत हो गई तो बेटी की पूरी जिम्मेदारी कृष्णा के कंधों पर आ गई। वह बताती हैं कि बेटी की हालत देख ससुरालों ने भी मुंह फेर लिया और कृष्णा की बेबसी देख उनके अपने भी रूठ गए।
रुपया-पैसा, जमीन जायदाद कुछ नहीं बचा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी तरह असहाय लोगों का दुख समझा और लोगों की सेवा का संकल्प लिया।
कृष्णा बेटी को समाज में जीना सिखाने के लिए फूलबाग स्पास्टिक सेंटर पढ़ने भेजती हैं। बेटी की तरह स्पेशल बच्चों को देश-विदेश में होने वाली स्पेशल ओलंपिक प्रतियोगिता के लिए ट्रेनिंग देती हैं। निर्धन बच्चों से कोई शुल्क नहीं लेती।