फौजियों को लेकर जाना जाता है मझगवां गांव
यही कारण है कि क्षेत्र का मझगवां गांव फौजियों को लेकर जाना जाता है। मुख्यालय से 100 किमी दूर इस गांव में राष्ट्र रक्षा के भाव यहां के लोगों की रगों में दौड़ रहा है। इस गांव के 37 सपूत देश रक्षा के लिए सरहदों में तैनात है।
फौज में हैं कई परिवारों की दो-तीन पीढ़ियां
वहीं 300 से अधिक लोग सेवानिवृत्त होने के बाद गांव में रहते है। इतना ही नहीं गांव के कई परिवार ऐसे है, जिनकी दो-तीन पीढ़ियां देश रक्षा में लगी रही। वहीं कई लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों को इसके लिए तैयारी करा रहे है। गांव में करीब 25 युवा तैयारी में लगे है। इसमें सेवानिवृत्त सैनिक उनकी मदद कर रहे हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के पेंशनभोगी भी गांव में
सैनिक पुनर्वास कार्यालय के वरिष्ठ लिपिक विनोद सिंह ने बताया कि मझगवां गांव निवासी पारवती देवी को उनके कार्यालय से प्रतिमाह छह हजार रुपये पेंशन मिल रही है। उनके पति रक्षपाल सिंह द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान सेना में कार्यरत थे। उनके मरणोपरांत पेंशन उनकी पत्नी को दी जा रही है।
मेरे पिता स्व. बड़ेलाल सेना में थे। सेना से सूबेदार के पद से रिटायर्ड हुए थे। राष्ट्रसेवा का जज्बा उन्हीं से मिला। जिस पर मै सेना में भर्ती हो गया और मौजूदा में सेवानिवृत्त हूं। -विनोद सिंह, पूर्व नायक
मेरे चाचा स्व.हवलदार जगरूप सिंह मेरे प्रेरणास्रोत रहे। उन्हीं के दिशा निर्देशन में 1979 में मैने भोपाल बीआरओ से भर्ती होकर देश सेवा की। -शिवनाथ सिंह, पूर्व हवलदार
देश सेवा व देश प्रेम इस गांव की मिट्टी में है। यह हमें विरासत में मिला है। मै सेना के कई ऑपरेशनों में शामिल रहा। मुझे गर्व है कि मैं भारतीय सेना का हिस्सा रहा। -रामजीवन सिंह, पूर्व नायक
हमारे गांव में सेना भर्ती का माहौल शुरू से ही रहा है। इसकी मदद से मैं सेना में आसानी से भर्ती हुआ। वर्तमान में मैं युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करता हूं। -भूपेंद्र सिंह, पूर्व हवलदार