कानपुर। मर्चेंट चैंबर ऑफ उत्तर प्रदेश की ट्रेड समिति और कानपुर होटल रेस्टोरेंट एसोसिएशन के संयुक्त सहयोग से भारतीय खाद्य सुरक्षा के अनुपालन एवं प्रवर्तन की चुनौती विषय पर चेंबर हाल में गोष्ठी का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि तलने की प्रक्रिया में तेल के बार-बार प्रयोग से उसमें विभिन्न हानिकारक रासायनिक तत्व बनते हैं जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा करते हैं।
मुख्य वक्ता फ्राइंग प्रोसेस एवं टीपीसी विशेषज्ञ मितेष गांधी ने बताया कि एक जुलाई 2018 से लागू नियम के तहत टीपीसी / टीपीएम 25 से अधिक होने पर वह तेल केवल अधिकृत बॉयो डीजल निर्माता या साबुन निर्माताओं को ही बेचा जा सकता है। जिन इकाइयों में प्रतिदिन 40 लीटर या उससे अधिक तेल का उपयोग तलने के लिए होता है उन्हें प्रतिदिन का टीपीसी/ टीपीएम चार्ट मेंटेन करना अनिवार्य है। मुख्य अतिथि एचबीटीयू के कुलपति प्रोफेसर शमशेर ने कहा कि निर्माण के प्रत्येक चरण में शुद्धता एवं गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि खाद्य सुरक्षा स्टाफ को स्वच्छता के प्रति जागरूक एवं प्रेरित किया जाना चाहिए। गोल्डी ग्रुप के सह संस्थापक सुरेंद्र गुप्ता, मंटोरा ग्रुप के निदेशक जगदीश गुप्ता, सेंट्रल होटल के अश्विनी कोहली, होटल रॉयल क्लिफ, होटल ब्लिस एवं होटल एटर्निटी के हरदीप सिंह मक्कड़, बनारसी मिष्ठान भंडार के जीवन कुमार अग्रवाल को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस मौके पर सहायक आयुक्त एफएसएसआई संजय प्रताप सिंह विजय पांडे, टीकम चंद सेठिया, ईश्वर वर्मा, गीता गुप्ता, संदीप जैन, सहस्त्रांशु अग्रवाल आदि मौजूद रहे।
तेल के काला या खराब होने के प्रमुख कारण:
- तेल में पानी, हल्दी, मिर्च एवं अन्य मसालों का उच्च तापमान पर मिलना।
- तलने के दौरान साबुन जैसे चिकनाईदार पदार्थ का निर्माण, जो तेल को काला करता है।
- खाद्य पदार्थों के बार-बार जलने से भी तेल की गुणवत्ता में गिरावट आती है।