करेंसी की किल्लत की हकीकत मंगलवार को और खुलकर सामने आ गई। सौ के नोटों की बढ़ी डिमांड को पूरा करने के लिए रिजर्व बैंक को रिजेक्टेड नोट बैंकों में भेजने पड़े। कटे, फटे, सड़े नोटों की वजह से बैंकों का काम बढ़ गया। नोट में फिसलन न होने की वजह इन्हें गिनने और बांटने में टाइम लग रहा है। बैंकों ने दबी जुबान इस पर आपत्ति जताई है।
रिजर्व बैंक के सूत्र बताते हैं कि हर माह करीब 20 हजार करोड़ रुपये के नोट रिजेक्ट होते हैं। इन नोटों की दो कैटेगरी होती हैं। पुन: प्रचलन के योग्य व नष्ट किए जाने योग्य नोट। रिजेक्टेड नोटों में से कुछ नोट छांट कर दोबारा प्रचलन में लाए जाते हैं, लेकिन हजार व पांच सौ के नोटों की बंदी के बाद सौ के नोटों की किल्लत बढ़ गई है। नई छपाई के नोट जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इस वजह से रिजर्व बैंक को नष्ट किए जाने योग्य नोट भी मार्केट में उतारने पड़े। बताते हैं कि ऐसे नोटों का मूल्य करीब एक लाख करोड़ रुपये है। इसमें सौ के नोट अधिक हैं। दस, बीस पचास के नोटों की संख्या कम है।
गिनने में लग रहा टाइम
भारतीय स्टेट बैंक के एक प्रबंधन ने बताया कि नोट इतने पुराने हैं कि उन्हें आहिस्ते से ही गिना जा सकता है। नोटों में फिसलन न होने की वजह से गिनने में टाइम लग रहा है। एक व्यक्ति का फार्म ऑनलाइन अपडेट करने व चार हजार रुपये गिनकर देने में कम से कम दो से तीन मिनट का टाइम लग जाता है। यदि ये नोट नए हों तो गिनने की जरूरत नहीं पड़ती। नंबरों के हिसाब से उन्हें एक से 40 और 41 से 80 के क्रम में बांटा जा सकता था। यह काम महज पांच से 10 सेकेंड में हो जाता।
एटीएम में घेर रहे ज्यादा जगह
जानकार बताते हैं कि एटीएम में सौ के पुराने नोट रखने से उसकी ट्रे जल्दी भर जा रही है। दरअसल पुराना नोट धूल मिट्टी और पानी के संपर्क में आकर मोटा हो जाता है। इस वजह से वह ट्रे में ज्यादा जगह घेरता है और नोट कम आते हैं। इसकारण भी एटीएम जल्दी खाली हो जा रहे हैं।