कोरोना ने रमजान में निहारी-कुल्चे के महीने भर के करीब 10 करोड़ के कारोबार को झटका दिया है। पहली रमजान पर शनिवार को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सहरी के वक्त बिल्कुल सन्नाटा पसरा रहा। अजमेरी चौराहा, रूपम चौराहा, कायस्ताना रोड, तलाक महल में गर्म मसालों की महक हवाओं से गायब थी। रमजान में मुस्लिम बहुल इलाकों में मशहूर डिश निहारी-कुल्चे की बहुत मांग रहती है। कुछ लोग सहरी और ज्यादातर लोग इफ्तार के बाद इसे खाते हैं।
रमजान का चांद निकलने के महीने भर पहले से ही बकरों के पायों का इंतजाम होता आया है। शहर के अलावा पायों की आपूर्ति कोलकाता से भी होती रही है। इस मौके पर चमनगंज, बेकनगंज, नई सड़क, कर्नलगंज की निहारी-कुल्चों की एक दुकान मेें लगभग डेढ़ से दो हजार पायों की प्रतिदिन खपत होती थी। दुकानदार रियाज वारसी का कहना है कि सिर्फ मुस्लिम ही नहीं सभी जाति और बिरादरी के लोगों की यह डिश पसंदीदा रही है। सभी को इसका इंतजार रहता रहा है लेकिन इस बार यह कारोबार शून्य हो गया है।
मुस्लिम एसोसिएशन के पदाधिकारी मो. इरफान अंसारी और तहारत मंच के संयोजक तारिक मुस्तफा का कहना है कि महीने भर में निहारी-कुल्चों से ही 10 करोड़ से अधिक का कारोबार हो जाता था। इसमें नांद रोटी, कुल्चों आदि के कारीगर भी बाहर से आकर यहां रोजगार पाते थे। लेकिन इस बार कोरोना ने सब चौपट कर दिया।