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Kanpur: 70 गुना बढ़ जाता रमजान में इबादत का सवाब, जानिए सहरी और इफ्तार का समय

Tue, 12 Mar 2024 07:54 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

रमजान का पावन महीना शुरू हो गया है। कानपुर में सहरी और इफ्तार के लिए बाजारों में खरीदारी हुई। उलमा ने लोगों से अपील की है कि पाबंदी से नमाज पढ़ें और रोजा रखें।
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रमजान 2024 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रमजान मुबारक का चांद सोमवार को नजर आने के बाद मुबारकबादी का सिलसिला शुरू हो गया। मस्जिदों और विभिन्न संस्थानों के कैंपस में लोगों ने तरावीह की नमाज अदा की। मंगलवार को लोगों ने पहला रोजा रखा। इस मौके पर उलमा ने लोगों से अपील की है कि पाबंदी से नमाज पढ़ें और रोजा रखें। रमजान महीने में इबादत का सवाब 70 गुना बढ़ जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का खास ख्याल रखने के साथ ही गरीब बस्तियों में सहरी और इफ्तार का इंतजाम कराने की अपील की गई। बाजारों में लोगों ने खरीदारी की।
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ऑल इंडिया गरीब नवाज काउंसिल के कौमी सदर मौलाना मो. हाशिम अशरफी ने कहा कि रमजान मुबारक महीना है। लोग इसका एहतिमाम करें। वहीं, जमीअत उलमा के प्रदेश उपाध्यक्ष मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्लाह कासनी ने लोगों से अपील की है कि रमजान के एहतराम में खुले आम खाने-पीने से बचें। रमजान में मुल्क की तरक्की और अमन की दुआ करें। चांद की तस्दीक होने के बाद मुस्लिम बहुल इलाकों के बाजारों में माहौल बदल गया। तलाक महल, बेकनगंज समेत विभिन्न इलाकों में लोग सहरी और इफ्तार के सामान की खरीदारी करते रहे। 

पहला अशरा रहमत का
शहर काजी मौलाना मुश्ताक मुशाहिदी ने बताया कि रमजान का पहला अशरा रहमतों का होता है। इस दौरान सारा वक्त इबादत में लगाएं। रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत और तीसरा अशरा जहन्नम से छुटकारे का होता है। अशरा का मतलब हिस्सा होता है। रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है।
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अल-शरिया हेल्पलाइन से पूछे मसले
प्रश्न- घर में तरावीह हो रही है तो फर्ज़ नमाज़ की जमाअत भी घर में कर सकते हैं या नहीं ?
- फर्ज़ नमाज़ की जमाअत मस्जिद में छोड़ना बिना किसी कारण के दुरुस्त नहीं है। इस लिए अगर मस्जिद आने जाने में कोई शरई परेशानी ना हो तो इशा की नमाज जमाअत के साथ मस्जिद में पढ़ना वाजिब है, फर्ज़ पढ़ कर फिर तरावीह घर में पढ़ना चाहिए।

प्रश्न- औरतें किसी हाफिज़ के पीछे तरावीह पढ़ सकती हैं ?
- औरतों के लिए घरों से निकल कर इधर-उधर जाकर तरावीह पढ़ने की ज़रूरत नहीं। उनके लिए घर में ही अकेले पढ़ना अफज़ल है, अगर घर में ही किसी हाफिज़ की व्यवस्था हो जाए तो पर्दे के साथ घर में रहते हुए हाफिज़ के पीछे कुरआन सुनना बेहतर है।

प्रश्न - क्या हाफिज़ बैठ कर तरावीह पढ़ा सकते हैं ?
- अगर किसी कारण से वह क़याम ना कर सकते हों और बैठ कर सजदा ज़मीन पर पेशानी टेक कर लेते हों तो वह बैठ कर तरावीह पढ़ा सकते हैं।
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दूसरा रोजा इफ्तार (13 मार्च)
सुन्नी- 6ः18 बजे
शिया- 6ः29 बजे

तीसरा रोजा सहरी (14 मार्च)
सुन्नी- 4ः58 बजे
शिया- 4ः49 बजे
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